जब शाहरुख़ ख़ान की आईपीएल टीम कोलकाता नाइट राइडर्स ने एक बांग्लादेशी क्रिकेट खिलाड़ी को इंडियन प्रीमियर लीग के लिए ख़रीदा, तो देश के कुछ नेताओं और स्वयंभू कथावाचकों ने शाहरुख़ ख़ान पर “गद्दार” होने तक के आरोप लगा दिए।
उन पर राष्ट्रविरोधी सोच, देशभक्ति की कमी और न जाने क्या-क्या ठप्पे लगाए गए।
लेकिन इसी देश की सरकार के विदेश मंत्री एस. जयशंकर जब बांग्लादेश जाकर वहाँ की पूर्व प्रधानमंत्री के निधन पर शोक व्यक्त करते हैं, तो वही लोग मौन साध लेते हैं।
न कोई राष्ट्रवाद याद आता है, न कोई सवाल उठता है।
तो क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है?
खेल बनाम कूटनीति – सुविधा के हिसाब से देशभक्ति
आईपीएल एक व्यावसायिक और वैश्विक खेल लीग है।
यहाँ ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, अफ़ग़ानिस्तान, वेस्टइंडीज़, दक्षिण अफ्रीका—दुनिया भर के खिलाड़ी खेलते हैं।
टीमों का चयन टैलेंट और नियमों के आधार पर होता है, न कि पासपोर्ट देखकर।
अगर किसी बांग्लादेशी खिलाड़ी को लेना देशद्रोह है,
तो फिर विदेशी नीति, राजनयिक संबंध, द्विपक्षीय सम्मान—ये सब क्या हैं?
क्या देशभक्ति सिर्फ़
• फ़िल्मी सितारों के लिए अलग है?
• कॉरपोरेट मालिकों के लिए अलग है?
• और सत्ता में बैठे लोगों के लिए बिल्कुल अलग?
राष्ट्रवाद अगर सिद्धांत है, तो सब पर समान क्यों नहीं?
विदेश मंत्री का बांग्लादेश जाना राजनयिक मर्यादा है—यह सही है।
लेकिन शाहरुख़ ख़ान द्वारा एक खिलाड़ी को खरीदना भी खेल की मर्यादा के भीतर है।
फिर सवाल यह है कि—
👉 एक को गद्दार और दूसरे को राष्ट्रसेवक क्यों?
👉 क्या राष्ट्रवाद अब तर्क नहीं, बल्कि हथियार बन चुका है?
👉 क्या आलोचना सिर्फ़ उन्हीं पर होगी जो सत्ता में नहीं हैं?
कथावाचकों और नेताओं की चुप्पी सबसे बड़ा जवाब
जो लोग मंचों से देशभक्ति का पाठ पढ़ाते हैं,
जो भावनाओं को भड़काकर तालियाँ बटोरते हैं
वे तब चुप क्यों हो जाते हैं जब सवाल सत्ता से जुड़ता है?
क्योंकि वहाँ सुविधा ख़तरे में पड़ती है।
निष्कर्ष: राष्ट्रवाद चयनात्मक नहीं हो सकता
देशभक्ति कोई रीयलिटी शो नहीं,
कि जब मन किया ऑन कर लिया, जब मन किया ऑफ।
अगर नियम सबके लिए एक हैं,
तो सवाल भी सबके लिए एक जैसे होने चाहिए।
वरना यह साफ़ है कि
👉 यह राष्ट्रवाद नहीं, राजनीतिक पाखंड है।
👉 यह सिद्धांत नहीं, दोहरा मापदंड है।
और इतिहास गवाह है—
दोहरा मापदंड हमेशा बेनक़ाब होता है।

