देवभूमि या डीलभूमि ??

by | May 21, 2026

उत्तराखंड बना था सपनों का राज्य।पहाड़ों की सादगी, गंगा की पवित्रता और ईमानदार लोगों की मेहनत से एक नया भविष्य लिखने का सपना था।लेकिन जैसे ही राज्य बना, कुछ नेताओं और कुछ अफसरों ने इसे “देवभूमि” कम और “डीलभूमि” ज़्यादा समझ लिया।पहाड़ों में सड़क कम बनी, लेकिन फाइलों में पुल, सुरंग, योजनाएँ और घोटाले खूब बन गए।यहाँ बारिश कम होती है, लेकिन टेंडरों की बाढ़ हर साल आ जाती है।कभी शराब नीति में खेल, कभी खनन में मेल, कभी जमीनों का खेल, तो कभी बिजली परियोजनाओं के नाम पर जनता की जेब पर तेल।उत्तराखंड की नौकरशाही भी बड़ी अद्भुत है।यहाँ कुछ अफसर ऐसे हैं जिनकी कुर्सी का स्प्रिंग सत्ता के साथ अपने आप घूम जाता है।सरकार बदलती है, मुख्यमंत्री बदलते हैं, झंडे बदलते हैं…लेकिन फाइलों में बैठे “स्थायी महारथी” नहीं बदलते।नेता कहते हैं —“भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस।”और अफसर मन ही मन मुस्कुराते हैं —“जी सर, इसलिए अब सीधे कैश नहीं… सिस्टम से काम होगा।”देवभूमि में कई बार ऐसा लगता है कि योजनाएँ जनता के लिए नहीं, बल्कि कमीशन की कैलोरी बढ़ाने के लिए बनाई जाती हैं।यहाँ एक सड़क पाँच बार बनती है —पहली बार टेंडर में,दूसरी बार उद्घाटन में,तीसरी बार बारिश में बहने के लिए,चौथी बार मरम्मत के नाम पर,और पाँचवीं बार चुनाव आने पर।उत्तराखंड का आम आदमी बड़ा भोला है।वो अब भी मानता है कि नेता उसके लिए लड़ रहे हैं।जबकि कई नेता और अफसर मिलकर सिर्फ इस बात पर लड़ते हैं कि मलाई कौन खाएगा।यहाँ कुछ अफसरों की हालत ऐसी है कि अगर फाइल में “जनहित” लिखा देख लें तो उन्हें एलर्जी हो जाती है।लेकिन अगर उसी फाइल में “विशेष अनुमति” और “ऊपर से निर्देश” लिखा हो, तो रात दो बजे भी ऑफिस खुल जाता है।सबसे मजेदार बात ये है कि हर घोटाले के बाद एक “उच्च स्तरीय जांच समिति” बनती है।फिर समिति रिपोर्ट बनाती है।फिर रिपोर्ट फाइल में जाती है।फिर फाइल अलमारी में जाती है।और फिर अलमारी लोकतंत्र की समाधि बन जाती है।उत्तराखंड में भ्रष्टाचार अब सिर्फ अपराध नहीं रहा,एक “सांस्कृतिक कार्यक्रम” बन चुका है।फर्क सिर्फ इतना है कि जनता टिकट खरीदकर नहीं, टैक्स देकर ये शो देखती है।लेकिन कहानी पूरी निराशा की भी नहीं है।क्योंकि इस राज्य में आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो सवाल पूछते हैं।कुछ पत्रकार, कुछ सामाजिक कार्यकर्ता, कुछ जिद्दी लोग — जो सिस्टम के सामने झुकने से इनकार करते हैं।यही लोग उम्मीद हैं कि देवभूमि एक दिन फिर सच में देवभूमि बनेगी,न कि “डीलभूमि प्राइवेट लिमिटेड।”और आखिर में उत्तराखंड की राजनीति पर एक छोटा सा व्यंग्य —“यहाँ पहाड़ तो स्थिर हैं,पर सिद्धांत रोज़ खिसक जाते हैं।नेता बदलते दल ऐसे,जैसे पर्यटक मौसम देखकर होटल बदल जाते हैं।”