प्रशासन में अक्सर दो तरह के अधिकारी दिखाई देते हैं — एक वे जो केवल कुर्सी संभालते हैं, और दूसरे वे जो व्यवस्था संभालते हैं। हरिद्वार के वर्तमान जिलाधिकारी मयूर दीक्षित को लेकर जिले में जो चर्चा सुनाई देती है, वह उन्हें दूसरी श्रेणी में खड़ा करती है।
आईएएस अधिकारी मयूर दीक्षित वर्तमान में हरिद्वार के जिलाधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।
हरिद्वार जैसा जिला केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं है। यह धर्म, उद्योग, ग्रामीण क्षेत्र, शहरी विस्तार, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और कानून-व्यवस्था जैसी अनेक चुनौतियों का संगम है। ऐसे जिले को संभालना केवल आदेश जारी करने का काम नहीं, बल्कि लगातार मैदान में रहकर व्यवस्था को जीवित रखने का कार्य है।
मयूर दीक्षित की कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सौम्यता और उपलब्धता मानी जाती है। आम लोगों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक, अनेक लोग यह महसूस करते हैं कि शिकायतों को सुनने और उन पर त्वरित प्रतिक्रिया देने की उनकी शैली प्रशासन को जनता के अधिक निकट लाती है। एक जिलाधिकारी का फोन उठाना भले छोटी बात लगे, लेकिन आम नागरिक के लिए यही भरोसा प्रशासन की सबसे बड़ी ताकत बनता है।
पिछले समय में हरिद्वार प्रशासन द्वारा कई मामलों में सख्ती दिखाई गई। अवैध गतिविधियों, अतिक्रमण और प्रशासनिक लापरवाही के मामलों में कार्रवाई की गई। कांवड़ यात्रा की तैयारियों के दौरान बड़े स्तर पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी प्रशासन की सक्रियता का उदाहरण बनी।
स्वास्थ्य सेवाओं और जनहित के मुद्दों पर भी प्रशासन ने हस्तक्षेप किया। हरिद्वार में उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की निगरानी, अनियमित निजी अस्पतालों पर कार्रवाई और जमीनी स्तर पर सर्वेक्षण जैसे कदम प्रशासन की सक्रियता को दर्शाते हैं।
हरिद्वार में चर्चित भूमि मामलों और प्रशासनिक अनियमितताओं पर भी जांच और कानूनी कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़ाए गए।
लेकिन किसी अधिकारी की असली पहचान केवल सख्ती से नहीं बनती। सख्ती तो कई लोग दिखा लेते हैं। असली चुनौती होती है — सख्ती और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाना।
यही कारण है कि हरिद्वार में कई लोग मयूर दीक्षित को एक ऐसे अधिकारी के रूप में देखते हैं जो नियमों के प्रति कठोर हैं, लेकिन व्यवहार में विनम्र। जो सिस्टम को व्यक्ति-आधारित नहीं, बल्कि प्रक्रिया-आधारित बनाना चाहते हैं। जो चाहते हैं कि काम किसी सिफारिश से नहीं, बल्कि नियमों से हो।
आज जब जनता का सरकारी संस्थाओं पर विश्वास कई बार कमजोर पड़ता दिखाई देता है, तब ऐसे अधिकारी प्रशासन और नागरिकों के बीच विश्वास की कड़ी बनते हैं।
हरिद्वार की जनता आने वाले वर्षों में मयूर दीक्षित के कार्यकाल का मूल्यांकन अपने अनुभवों के आधार पर करेगी, लेकिन वर्तमान में जिले में जो चर्चा सुनाई देती है, वह यही कहती है कि प्रशासनिक व्यवस्था में सक्रियता, जवाबदेही और जनसंपर्क की एक नई शैली दिखाई दी है।
और शायद यही किसी भी जिलाधिकारी की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है —
जब लोग उसके पद से नहीं, उसके काम से उसे पहचानने लगें।

