नहीं है।
लड़ाई बेरोजगारी से है।
लड़ाई पलायन से है।
लड़ाई शिक्षा और स्वास्थ्य से है।
लड़ाई भ्रष्टाचार से है।
लेकिन इन मुद्दों पर बात करने में मेहनत लगती है।
पहाड़-मैदान पर बयान देने में सिर्फ माइक्रोफोन लगता है।
इसलिए यह बहस कभी खत्म नहीं होती।
एक और कहावत याद आती है—
“जब घर में अनाज न हो तो लोग बर्तन गिनना शुरू कर देते हैं।”
उत्तराखंड में भी जब असली मुद्दों पर जवाब देना मुश्किल हो जाता है, तब पहाड़ और मैदान की बहस निकाल ली जाती है।
सच्चाई यह है कि पहाड़ उत्तराखंड की आत्मा है और हरिद्वार उसकी धड़कन।
आत्मा और धड़कन लड़ने लगें तो शरीर ज्यादा दिन नहीं चलता।
लेकिन राजनीति में तर्क कहाँ चलते हैं?
यहाँ तो वही चलता है—
“न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी, लेकिन पहाड़-मैदान की बहस जरूर चलेगी!”
और तब तक बेचारा हरिद्वार बैठा यही सोचता रहेगा—
“कमाऊ पूत मैं, और झगड़ा भी मेरे नाम पर!” 😄

