जब कानून का रक्षक ही कानून तोड़ता दिखे, तो सवाल उठेंगे ही
देहरादून के एक पॉलीटेक्निक संस्थान का वीडियो इन दिनों चर्चा में है। वीडियो में जो दिखाई दे रहा है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक दरोगा का बेटा उसी संस्थान में पढ़ता है और नकल को लेकर हुए विवाद के बाद दरोगा स्वयं संस्थान में पहुंच गया। वीडियो में कथित रूप से वह आते ही मारपीट करता दिखाई देता है।
अगर वीडियो में दिख रही तस्वीरें सही हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार किसी को किसने दिया?
पुलिस की वर्दी कानून लागू करने के लिए दी जाती है, कानून तोड़ने के लिए नहीं।
FIR दोनों तरफ़ से क्यों?
सबसे दिलचस्प सवाल यही है। अगर वीडियो में एक पक्ष स्पष्ट रूप से हमला करता दिखाई दे रहा है, तो फिर दोनों पक्षों पर मुकदमा दर्ज करने की क्या मजबूरी थी?
क्या यह निष्पक्ष जांच का हिस्सा है?
या फिर यह वही पुरानी व्यवस्था है जिसमें ताकतवर और कमजोर को एक ही तराजू में रखकर मामला बराबर करने की कोशिश की जाती है?
जनता इसलिए सवाल पूछ रही है क्योंकि वीडियो में घटनाक्रम दिखाई दे रहा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि लोग जानना चाहेंगे कि पुलिस ने FIR दर्ज करने का आधार क्या बनाया।
नकल रोकना अपराध कब से हो गया?
यदि आरोप सही हैं कि विवाद की जड़ नकल रोकना था, तो यह और भी चिंताजनक है।
देश में शिक्षा व्यवस्था पहले ही नकल, पेपर लीक और सिफारिशों की बीमारी से जूझ रही है। अगर कोई शिक्षक, कर्मचारी या संस्थान नियम लागू करने की कोशिश करे और उसके बदले उसे मारपीट का सामना करना पड़े, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं है—
यह पूरी शिक्षा व्यवस्था को दिया गया गलत संदेश है। वर्दी का सम्मान करना स्वयं की जिम्मेदारी है ।समाज पुलिस का सम्मान करता है क्योंकि वह कानून की रक्षा करती है।
लेकिन जब कोई पुलिस अधिकारी अपने पद या प्रभाव का इस्तेमाल निजी विवाद में करता हुआ दिखाई देता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान पुलिस की छवि को ही होता है।
एक दरोगा की गलती का बोझ हजारों ईमानदार पुलिसकर्मियों को उठाना पड़ता है, जो दिन-रात मेहनत से अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। जांच निष्पक्ष होनी चाहिए इस मामले में किसी को पहले से दोषी ठहराना भी ठीक नहीं है और किसी को बचाना भी ठीक नहीं है।
लेकिन जांच का आधार सिर्फ पद, वर्दी या प्रभाव नहीं होना चाहिए। जांच का आधार वीडियो, गवाह, साक्ष्य और तथ्य होने चाहिए।
अगर वीडियो में जो दिख रहा है वही सच है, तो कार्रवाई भी उसी अनुपात में होनी चाहिए।
और अगर वीडियो अधूरा है, तो पूरी सच्चाई जनता के सामने रखी जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल
आज उत्तराखंड की जनता सिर्फ एक सवाल पूछ रही है।अगर यही काम किसी आम नागरिक ने किया होता, तो क्या पुलिस उसके खिलाफ भी उतनी ही नरमी दिखाती?
कानून की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता होती है। और सबसे बड़ी कमजोरी भी वही होती है जब जनता को लगने लगे कि कानून सबके लिए बराबर नहीं है।
इसलिए यह मामला सिर्फ एक पॉलीटेक्निक या एक दरोगा का नहीं है। यह उत्तराखंड में कानून के राज, पुलिस की साख और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल है।

