आईपीएस परमेंद्र डोभाल और मेरा टकराव

by | Jun 8, 2026

जीवन और सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि व्यक्ति अपने निजी अनुभवों और मतभेदों से ऊपर उठकर भी किसी की क्षमता और कार्यशैली का सम्मान कर सकता है।

आईपीएस अधिकारी परमेंद्र डोभाल के साथ मेरा संबंध कभी बहुत सहज नहीं रहा। वर्ष 2010-11 के दौर में परिस्थितियाँ ऐसी रहीं कि सरकार के इशारे पर मेरे खिलाफ़ जो भी संभव था, वह किया गया। उस समय हमारे बीच टकराव भी था, मतभेद भी थे और संघर्ष भी। आज भी मुझे या अधिकारी बहुत पसंद नहीं है । मेरा इनके साथ एक बार नहीं कई बार टकराव हो चुका है। सरकार और मेरे राकेश के बीच मेरे घर पर रेड करने से लेकर एससी/एसटी के मुकदमे दर्ज करना , इनामी बदमाश घोषित करना , LOC जारी करने से लाकर तमाम हथकंडे डोभाल ने इस्तेमाल किए पर फिर भी मुझे गिरफ्तार नहीं कर पाये, शायद इस बात का मलाल उन्हें हमेशा रहेगा कि एक 25 साल के लड़के ने आईए युवा अधिकारी को कितना दौड़ाया था।

लेकिन यदि मैं उन व्यक्तिगत अनुभवों और पुराने विवादों को एक तरफ़ रख दूँ, तो एक बात पूरी ईमानदारी से कह सकता हूँ कि परमेंद्र डोभाल उत्तराखंड पुलिस के सबसे सक्षम मेहनती और परिणाम देने वाले अधिकारियों में से एक हैं।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे कुर्सी पर बैठकर पुलिसिंग नहीं करते, बल्कि मैदान में उतरकर नेतृत्व करते हैं। चाहे विशाल और चुनौतीपूर्ण कांवड़ मेला हो, जहाँ करोड़ों श्रद्धालुओं की सुरक्षा और यातायात व्यवस्था किसी युद्ध संचालन से कम नहीं होती, या फिर संगठित अपराध और अपराधियों पर लगाम कसने का काम, डोभाल ने हर जिम्मेदारी को पूरी गंभीरता और दक्षता के साथ निभाया है।

उनकी कार्यशैली में निर्णय लेने की क्षमता है, दबाव में काम करने का साहस है और कानून-व्यवस्था को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण है। यही कारण है कि अधीनस्थ अधिकारी भी उन्हें एक सख्त लेकिन प्रभावी नेतृत्वकर्ता के रूप में देखते हैं। अपने अधीनस्थ अधिकारियों के लिए अपने उच्च अधिकारियों से लड़ जाना हो जनता के विरोध का सामना , वो कभी उन्हें अकेला नहीं छोड़ते।

आज के दौर में जब प्रशासनिक पदों पर बैठे लोगों की आलोचना करना आसान है, तब यह स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है कि अच्छे काम की सराहना होनी चाहिए, चाहे वह व्यक्ति आपका मित्र हो या कभी आपका विरोधी रहा हो।

लोकतंत्र की परिपक्वता भी यही कहती है कि विचारों और संघर्षों का विरोध किया जा सकता है, लेकिन योग्यता का नहीं।

मेरे और परमेंद्र डोभाल के बीच अतीत में जो भी रहा हो, लेकिन एक निष्पक्ष मूल्यांकन में मैं इतना अवश्य कहूँगा कि उत्तराखंड पुलिस को ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता है जो कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने का साहस रखते हों, व्यवस्था को परिणामों से परिभाषित करते हों और मैदान में उतरकर नेतृत्व करने की क्षमता रखते हों।

मतभेद इतिहास का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन प्रतिभा और कार्यकुशलता को स्वीकार करना ही निष्पक्षता की असली पहचान है।