उत्तराखंड के हर खड्डे-गड्ढे का जिम्मेदार मुख्यमंत्री है।

by | Jul 28, 2026

आलोचना कीजिए, लेकिन तथ्यों के आधार पर… एजेंडे के आधार पर नहीं

प्रेम नगर, देहरादून की घटना के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह यह प्रचारित किया गया कि “पुल टूट गया”, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या अब हम किसी भी घटना की सच्चाई जानने का इंतज़ार भी नहीं करते?

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार मामला पुल के ढहने का नहीं, बल्कि एप्रोच रोड के क्षतिग्रस्त होने का है। दोनों में तकनीकी रूप से बड़ा अंतर है। लेकिन अफसोस, सच सामने आने से पहले ही सोशल मीडिया की अदालत ने फैसला भी सुना दिया और राजनीतिक आरोपों की बौछार भी शुरू हो गई।

सबसे हैरानी की बात यह है कि आज हर घटना का पहला और आखिरी आरोपी सीधे मुख्यमंत्री को बना दिया जाता है। सवाल यह है कि क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि संबंधित परियोजना किस विभाग की है? निर्माण किस एजेंसी ने किया? रखरखाव किसके जिम्मे था? तकनीकी खामी कहाँ हुई? या फिर उद्देश्य सिर्फ एक राजनीतिक चेहरा तलाशना था?

लोकतंत्र में मुख्यमंत्री सरकार का मुखिया होता है, इसलिए उनसे सवाल पूछना पूरी तरह उचित है। लेकिन उतना ही उचित यह भी है कि सवाल तथ्यों पर आधारित हों। बिना जांच, बिना तकनीकी रिपोर्ट और बिना जिम्मेदार विभाग की पहचान किए किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहरा देना न्याय नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह है।

यदि किसी विभाग ने लापरवाही की है, किसी अधिकारी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई है, किसी ठेकेदार ने घटिया निर्माण किया है या रखरखाव में चूक हुई है, तो उन सभी के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। जवाबदेही तय होनी चाहिए—लेकिन सही व्यक्ति की।

दुर्भाग्य से आज एक वर्ग ऐसा भी है जिसके लिए हर घटना का निष्कर्ष पहले से तय होता है। घटना चाहे किसी भी विभाग से जुड़ी हो, दोष सीधे मुख्यमंत्री पर डाल देना मानो एक तयशुदा राजनीतिक प्रतिक्रिया बन गई है। इससे न तो व्यवस्था सुधरती है और न ही वास्तविक दोषियों तक पहुंचा जा सकता है।

लोकतंत्र में सत्ता की आलोचना आवश्यक है, लेकिन निष्पक्षता उससे भी अधिक आवश्यक है। यदि किसी उपलब्धि का श्रेय सरकार को दिया जा सकता है, तो किसी कमी की जिम्मेदारी भी तथ्यों के आधार पर तय होनी चाहिए—न कि सोशल मीडिया की ट्रेंडिंग हेडलाइन के आधार पर।

हमें तय करना होगा कि हमें राजनीति करनी है या सच की बात करनी है। क्योंकि जब हम हर घटना को राजनीतिक चश्मे से देखने लगते हैं, तब असली सवाल पीछे छूट जाते हैं और असली जिम्मेदार बच निकलते हैं।

सरकार से जवाब मांगिए, लेकिन पहले तथ्य जानिए।
आलोचना कीजिए, लेकिन निष्पक्ष होकर।
लोकतंत्र नारों से नहीं, सत्य और जवाबदेही से मजबूत होता है।