खोदा पहाड़ निकली चुहिया
कल तक सोशल मीडिया और कुछ समाचार माध्यमों में ऐसा माहौल बना दिया गया था मानो देहरादून के प्रेमनगर का पूरा पुल धराशायी हो गया हो। सुर्खियाँ थीं—“पुल गिर गया… सरकार फेल… मुख्यमंत्री जवाब दें…” लेकिन आज की यह तस्वीर उन सभी दावों से बड़ा जवाब है।
असलियत यह थी कि पुल नहीं, बल्कि पुल की एप्रोच रोड (Approach Road) का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ था। यानी मुख्य पुल सुरक्षित था। यही कारण है कि कुछ ही घंटों में मरम्मत का काम युद्धस्तर पर शुरू हुआ और यातायात फिर से बहाल कर दिया गया।
किसी भी आपदा या दुर्घटना में सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन तथ्यों की पुष्टि किए बिना अफवाह फैलाना या हर घटना को सीधे मुख्यमंत्री पर थोप देना भी उचित नहीं है।
यह भी पूछा जाना चाहिए कि:
• संबंधित निर्माण किस विभाग ने कराया था?
• रखरखाव की जिम्मेदारी किस एजेंसी की थी?
• तकनीकी कारण क्या थे?
हर समस्या का समाधान तथ्यों से निकलेगा, न कि केवल राजनीतिक शोर से।
सरकार की आलोचना होनी चाहिए, लेकिन जहाँ प्रशासन कुछ ही घंटों में स्थिति सामान्य कर दे, वहाँ उस प्रयास को स्वीकार करना भी निष्पक्षता का हिस्सा है।
लोकतंत्र में विपक्ष ज़रूरी है, लेकिन तथ्यों का विपक्ष नहीं होना चाहिए।
तिल का ताड़ बनाकर लोगों में भ्रम फैलाना आसान है, मगर सच्चाई की उम्र हमेशा अफवाह से लंबी होती है।

