हरदा जी की “गरीबी” — बेटा करोड़पति, पिता बेचारा मकान के लिए कर्जदार!
उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक नई किस्म की “गरीबी” चर्चा में है।
ऐसी गरीबी जिसमें आदमी मुख्यमंत्री रह चुका हो, केंद्रीय मंत्री रह चुका हो, सांसद रह चुका हो, दशकों तक सत्ता और संगठन के सर्वोच्च गलियारों में घूम चुका हो—और फिर एक दिन सोशल मीडिया पर जनता को बताना पड़े कि “मेरी मासिक आमदनी एक लाख से ऊपर है, मकान के लिए बैंक से कर्ज ले रहा हूँ।”
हरदा जी, ऐसी गरीबी उत्तराखंड के हर गरीब को मिल जाए तो शायद गरीबी रेखा खुद इस्तीफा दे दे!
लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट आगे है।
हरीश रावत जी दूसरों की अर्जित संपत्ति को व्यक्ति के “चरित्र” और “सार्वजनिक जीवन की स्वच्छता” से जोड़ रहे हैं।
वाह हरदा जी!
तो फिर यह पैमाना बहुत शानदार है।
बस एक छोटी-सी गुजारिश है—
तराजू दूसरों के लिए निकाला है तो एक बार अपने घर की तरफ भी घुमा दीजिए।
आपके पुत्र वीरेंद्र रावत ने 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने चुनावी हलफनामे में लगभग ₹10.90 करोड़ की संपत्ति घोषित की थी।
अब पिता जी सोशल मीडिया पर मकान के लिए बैंक लोन की कहानी सुना रहे हैं और पुत्र जी का चुनावी हलफनामा करोड़ों में है।
इसमें अपने आप कोई अपराध नहीं है। करोड़पति होना अपराध नहीं, संपत्ति बनाना भी अपराध नहीं।
मगर फिर दूसरों की संपत्ति को चरित्र का सर्टिफिकेट बनाने का शौक क्यों?
हरदा जी का राजनीतिक दर्शन शायद बड़ा सरल है—
दूसरे के पास करोड़ों हों तो पूछो—
“इतना पैसा आया कहाँ से?”
अपने परिवार के पास करोड़ों हों तो कहो—
“संघर्ष करके कमाया है!”
दूसरा मकान बनाए तो संपत्ति की जांच करो,
अपना मकान बने तो बैंक लोन की भावुक कहानी सुनाओ!
यही तो राजनीति का अद्भुत समाजवाद है—
सवाल सबकी संपत्ति पर, जवाब अपनी संपत्ति पर नहीं!
और हरदा जी, जब आपने बात “सार्वजनिक जीवन की स्वच्छता” तक पहुंचा ही दी है तो उत्तराखंड की जनता की याददाश्त इतनी भी कमजोर नहीं हुई है।
2016 का वह चर्चित स्टिंग प्रकरण कौन भूल गया? जब कह रहे थे 20-25 करोड़ कमा लो कोई दिक्कत नहीं
विधायकों के समर्थन और कथित लेन-देन से जुड़ी बातचीत के आरोपों वाला वह प्रकरण राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा। बाद में CBI ने मामला दर्ज किया। हरीश रावत इन आरोपों का विरोध करते रहे हैं और आरोप अपने आप दोषसिद्धि नहीं होते—लेकिन जिस व्यक्ति को आज दूसरों के सार्वजनिक जीवन की “स्वच्छता” नापनी है, उसके अपने राजनीतिक कार्यकाल से जुड़े इन सवालों पर चर्चा होना भी स्वाभाविक है।
और राजनीति का कमाल देखिए—
आज वही हरदा जी सार्वजनिक जीवन की शुचिता का आईना लेकर बाजार में निकले हैं!
आईना बहुत अच्छा है हरदा जी, बस उसे थोड़ा अपनी तरफ भी घुमाइए।
आप लिखते हैं कि कुछ लोग उत्तराखंड बनने के बाद “होल्डॉल और टिन का बक्सा” लेकर आए थे और आज करोड़ों के मालिक हैं।
नाम बताइए हरदा जी!
हम भी जानना चाहते हैं।
उनकी संपत्ति का हिसाब मांगिए।
उनके हलफनामे खोलिए।
उनकी कमाई पूछिए।
लेकिन फिर शुरुआत घर से कीजिए।
एक तरफ आपका बयान—
“मेरी मासिक आमदनी एक लाख से ऊपर है, मकान के लिए बैंक से कर्ज ले रहा हूँ।”
दूसरी तरफ बेटे का चुनावी हलफनामा—
लगभग ₹10.90 करोड़ की संपत्ति।
अब उत्तराखंड की जनता तय कर ले कि यहां चर्चा गरीबी की हो रही है, सादगी की हो रही है या राजनीतिक ब्रांडिंग की!
वैसे हरदा जी की राजनीति की एक खूबी हमेशा रही है—
सत्ता में हों तो अनुभवी राजनेता,
सत्ता से बाहर हों तो संघर्षशील नेता,
परिवार आगे बढ़े तो योग्यता,
दूसरे का परिवार आगे बढ़े तो परिवारवाद,
अपनी संपत्ति हो तो संघर्ष,
दूसरे की संपत्ति हो तो चरित्र का सवाल!
और अब राजनीति के इस लंबे सफर में नया अध्याय जुड़ गया है—
“करोड़पति परिवार का गरीब पिता!”
हरदा जी, बीमारी में आपके स्वास्थ्य की कामना हम भी करते हैं। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं और किसी की बीमारी उपहास का विषय नहीं होनी चाहिए।
लेकिन बीमारी के बहाने राजनीतिक सवालों से छुट्टी भी नहीं मिलती।
आपने स्वयं दूसरों की संपत्ति को सार्वजनिक जीवन की स्वच्छता और चरित्र से जोड़ा है। इसलिए अब जनता भी उसी पैमाने को आपके सामने रखेगी।
दूसरों के होल्डॉल और टिन के बक्से गिनने से पहले अपने घर के चुनावी हलफनामे खोलिए।
उत्तराखंड को यह भी बताइए कि मुख्यमंत्री रहते हुए आपके दौर पर उठे सवालों का आपका जवाब क्या है।
क्योंकि हरदा जी—
गरीबी का प्रमाणपत्र फेसबुक पोस्ट से नहीं मिलता,
और ईमानदारी का प्रमाणपत्र खुद लिखकर भी नहीं मिलता।
दोनों का फैसला जनता करती है।
और जनता की एक बड़ी खराब आदत है—
वह देर से सही, लेकिन हिसाब पूरा करती है।

