विचारों से लड़िए, किसी के संघर्ष का मज़ाक मत उड़ाइए
राजनीति में विरोध स्वाभाविक है।
नीतियों पर सवाल उठाइए, भाषणों की आलोचना कीजिए, फैसलों को कठघरे में खड़ा कीजिए और चुनाव में जनता से उन्हें नकारने की अपील भी कीजिए।
लेकिन क्या राजनीतिक विरोध का अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति को “जोकर” बनाकर प्रस्तुत कर दिया जाए?
सोशल मीडिया पर एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल की गोवा इकाई से जुड़ी यह पोस्ट देखकर यही सवाल मन में आता है। तस्वीर में एक प्रमुख विपक्षी नेता को विदूषक के रूप में दिखाया गया है और साथ में लिखा है—“Whether it’s 1980 or 2026, some characters remain unchanged.”
सवाल किसी एक नेता का नहीं है।
सवाल हमारी राजनीतिक संस्कृति के स्तर का है।
जिस व्यक्ति ने वर्षों तक सार्वजनिक जीवन में चुनावी हार देखी हो, राजनीतिक आलोचना झेली हो, देश भर में लंबी यात्राएँ की हों, हजारों किलोमीटर पैदल चलकर लोगों से संवाद किया हो और लगातार राजनीतिक मैदान में बना रहा हो—आप उसकी राजनीति से सौ प्रतिशत असहमत हो सकते हैं, लेकिन उसके संघर्ष को एक लाल नाक और जोकर की पोशाक में समेट देना क्या स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद है?
और यही कसौटी सभी दलों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
कल यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या भाजपा के किसी वरिष्ठ नेता की तस्वीर इसी तरह विकृत करके पोस्ट करे, तब भी मैं उसे उचित नहीं मानूँगा। राजनीतिक मर्यादा व्यक्ति देखकर तय नहीं हो सकती।
लोकतंत्र की खूबसूरती ही यह है कि यहां सबसे कट्टर विरोधी को भी अपनी बात रखने का अधिकार है। किसी नेता की नीति गलत है तो तथ्यों से उसका जवाब दीजिए। उसके वादे पूरे नहीं हुए तो आंकड़े सामने रखिए। उसकी विचारधारा से असहमति है तो वैचारिक मुकाबला कीजिए।
क्योंकि व्यंग्य और अपमान के बीच एक महीन लेकिन महत्वपूर्ण रेखा होती है।
एक बड़े राजनीतिक संगठन की ताकत उसके सोशल मीडिया ग्राफिक्स की क्रूरता से नहीं, बल्कि उसके तर्कों की मजबूती से दिखाई देनी चाहिए।
आज समस्या यह है कि राजनीति धीरे-धीरे इस स्तर पर पहुंच रही है जहां बहस कम और मीम ज्यादा हैं; विचार कम और व्यक्तिगत उपहास ज्यादा है। इससे कुछ हजार लाइक और शेयर जरूर मिल सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र का स्तर ऊंचा नहीं होता।
याद रखिए—
चेहरे का मज़ाक उड़ाना आसान है,
संघर्ष का जवाब देना मुश्किल।
तस्वीर को जोकर बनाया जा सकता है,
लेकिन किसी व्यक्ति के वर्षों के संघर्ष को नहीं।
राजनीति में प्रतिद्वंद्वी होना अपराध नहीं है।
आज वह सत्ता में है, कल विपक्ष में हो सकता है। आज जो विपक्ष में है, कल जनता उसे सत्ता सौंप सकती है। लोकतंत्र का पहिया किसी एक स्थान पर स्थायी नहीं रहता।
इसलिए असहमति जितनी तीखी हो, भाषा और प्रस्तुति उतनी ही जिम्मेदार होनी चाहिए।
राजनीति में लड़ाई जरूर हो—
लेकिन नीतियों की।
प्रहार जरूर हो—
लेकिन तथ्यों का।
व्यंग्य जरूर हो—
लेकिन ऐसा नहीं कि हम अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की मानवीय गरिमा ही भूल जाएँ।
लोकतंत्र में विरोधी को हराइए, अपमानित मत कीजिए।
क्योंकि राजनीति पांच साल की हो सकती है—संस्कार उससे कहीं लंबे चलते हैं।

