रावत जी, इस्तीफा नहीं… हिसाब दीजिए! OMR में युवाओं का भविष्य था या किसी और का कारोबार?

by | Sep 12, 2026

इस्तीफे की आड़ में सवालों से बचिए मत, रावत जी!

हरीश रावत जी का बयान पढ़ा।

कमाल का बयान है!

उसमें ईष्ट देवता भी आ गए, राहुल गांधी भी आ गए, खंडूरी जी भी आ गए, RSS भी आ गया, CBI-ED भी आ गई और चुनाव भी आ गया…

बस जो सबसे जरूरी था, उसका सीधा जवाब नहीं आया—

ED जिस कैश, सोने और महंगी घड़ियों की बरामदगी का दावा कर रही है, उसका हिसाब क्या है?

रावत जी कहते हैं—
“मुझे अपने सहयोगी पर विश्वास है।”

विश्वास रखिए साहब, कौन रोक रहा है?

लेकिन ED की जांच विश्वास से नहीं, हिसाब से चलेगी।

और गजब देखिए—

जब अपने आसपास जांच की आंच पहुंची तो चुनाव याद आ गया!

कहा—मैं तो मजाक में पहले ही कहता था कि चुनाव तब आएगा जब CBI मेरे दरवाजे पर दस्तक देगी।

रावत जी, चुनाव आयोग तारीख घोषित करता है या अब CBI की घंटी से उत्तराखंड में चुनाव का कैलेंडर तय होगा?

फिर आपने कांग्रेस के पद छोड़ने की घोषणा कर दी।

लेकिन सवाल यह है—

इस्तीफा किस बात का?

अगर सब कुछ राजनीतिक षड्यंत्र है तो पद क्यों छोड़ रहे हैं?

और अगर आपको लगता है कि कहीं कोई गंभीर चूक हुई है, तो केवल पद छोड़ने से हिसाब पूरा कैसे हो गया?

सबसे दिलचस्प शब्द आपने इस्तेमाल किया—

“Error of Judgment!”

उत्तराखंड का बेरोजगार नौजवान सालों तैयारी करे, मां-बाप पैसे लगाएं, बच्चा रात-रात भर पढ़े और यदि भर्ती व्यवस्था में उसकी मेहनत के साथ खिलवाड़ हुआ हो तो उसे क्या कहा जाएगा?

“Sorry बेटा, Error of Judgment था?”

नहीं रावत जी।

नौजवान की नौकरी कोई राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं है कि प्रयोग गलत निकला तो लिख दिया—

Error of Judgment!

और अब जरा असली सवाल पर आइए।

यदि OMR शीटों में छेड़छाड़ हुई तो किसके संरक्षण में हुई?

किसे फायदा मिला?

किसने पैसा लिया?

किसने आंखें बंद रखीं?

और पूरा नेटवर्क क्या था?

इन सवालों का जवाब उत्तराखंड चाहता है।

आपने स्वयं कहा है कि यदि आपके खिलाफ प्रमाण हैं तो CBI, ED या पुलिस को दिए जाएं और दोषी होने पर कानून आपको दंडित करे।

इस एक बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं।

जांच निष्पक्ष हो।

जिसका नाम निकले, वह कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हो—कार्रवाई हो।

लेकिन एक निवेदन है रावत जी—

ED घर पहुंचे तो “षड्यंत्र”,
कैश मिले तो “विश्वास”,
भर्ती पर सवाल उठे तो “Error of Judgment”,
और राजनीतिक मुश्किल आए तो “इस्तीफा”…

इतने सारे शब्दों के बीच कहीं “जवाबदेही” शब्द भी बचाकर रखिए।

क्योंकि उत्तराखंड की जनता अब भाषण नहीं, हिसाब चाहती है।

और उत्तराखंड का नौजवान केवल इतना पूछ रहा है—

“मेरी OMR में मेरा भविष्य लिखा था…
या किसी और का हिसाब?”

बाकी जांच एजेंसियां तय करेंगी।

पद छोड़ देने से सवाल नहीं छूटते, रावत जी।

— उमेश कुमार