भक्तों के लिए गोबर-गौमूत्र, अपने लिए डॉक्टर और विज्ञान!
कमाल का दौर है साहब!
मंच पर बैठकर ज्ञान दिया जाता है—
बीमारी है? गौमूत्र अपनाओ।
तकलीफ है? गोबर के गुण समझो।
आधुनिक चिकित्सा? अरे, ये तो पश्चिम की देन है!
लेकिन जैसे ही बीमारी खुद के दरवाज़े पर दस्तक देती है, अचानक विज्ञान से सारे मतभेद समाप्त!
फिर न गोबर याद आता है, न गौमूत्र की महिमा—
फिर याद आते हैं ब्लड टेस्ट, डॉक्टर, अस्पताल, मशीनें और आधुनिक मेडिकल साइंस।
वाह महाराज!
नुस्खा भक्तों के लिए देसी,
और इलाज अपना वैज्ञानिक!
अगर गौमूत्र इतना ही चमत्कारी है तो डॉक्टर की क्या जरूरत?
अगर गोबर में गंभीर रोगों का समाधान है तो आधुनिक जांच क्यों?
और अगर बीमारी के वक्त आखिरकार भरोसा डॉक्टर और विज्ञान पर ही करना है, तो गरीब भक्त को मंच से चमत्कारों की पुड़िया क्यों बाँटी जाती है?
असल खेल बड़ा सरल दिखाई देता है—
दूसरों की बीमारी में प्रवचन,
अपनी बीमारी में विशेषज्ञ।
दूसरों के लिए आस्था की परीक्षा,
अपने लिए मेडिकल साइंस की व्यवस्था!
गाय हमारी श्रद्धा हो सकती है, उसका सम्मान होना चाहिए—लेकिन गाय के सम्मान के नाम पर बिना वैज्ञानिक प्रमाण के इलाज के दावे बेचना श्रद्धा नहीं है।
सबसे बड़ा व्यंग्य यही है—
“जब तक बीमारी भक्त की है, समाधान आध्यात्मिक है;
जिस दिन बीमारी अपनी हुई, विज्ञान तत्काल आधिकारिक है!”
धर्म से आस्था रखिए, डॉक्टर से इलाज कराइए।
क्योंकि बीमारी प्रवचन सुनकर नहीं, सही उपचार से ठीक होती है।
और जो ज्ञान दूसरों को बाँटा जाए, कभी-कभी उसे खुद पर आज़माने की हिम्मत भी होनी चाहिए।

