हरीश रावत कांग्रेस की आफ़त

by | Sep 28, 2026

जनाधार कितना बड़ा? हरीश रावत के चुनावी रिकॉर्ड की पड़ताल

उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का नाम निस्संदेह लंबे राजनीतिक अनुभव वाले नेताओं में आता है। वे कई बार सांसद रहे, केंद्रीय मंत्री रहे और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी बने। लेकिन राजनीति में “जनाधार” को परखने का एक ठोस पैमाना प्रत्यक्ष चुनावों में जनता द्वारा दिया गया वोट भी है।

इसलिए किसी विशेषण या राजनीतिक बयान के बजाय आइए हरीश रावत के चुनावी इतिहास को वर्ष-दर-वर्ष देखते हैं।

पहले दौर में लगातार तीन लोकसभा जीत

लेकिन ये भी बता दूँ कि ये जीत उस समय दर्ज हुई जब कांग्रेस के पक्ष में चरम की लहर थी, घोड़े गधे भी जीत जाते थे।

हरीश रावत जी आपने अल्मोड़ा से 1980, 1984 और 1989 के लोकसभा चुनाव जीते। यह उनके राजनीतिक जीवन का मजबूत चुनावी दौर था।

1980 में उनका वोट शेयर लगभग 46.31%, 1984 में 61.26% और 1989 में 42.45% रहा।

लेकिन इसके बाद तस्वीर बदल गई।

1991 से शुरू हुआ लगातार चार लोकसभा हार का दौर

1991, अल्मोड़ा:
हरीश रावत को 1,20,616 वोट मिले, जबकि भाजपा के जीवन शर्मा को 1,49,761 वोट मिले।
हार का अंतर: 29,145 वोट।

1996, अल्मोड़ा:
भाजपा के बची सिंह रावत को 1,61,548 वोट मिले और हरीश रावत को 1,04,642 वोट।
हार का अंतर: 56,906 वोट।

1998, अल्मोड़ा:
बची सिंह रावत को 2,28,414 वोट और हरीश रावत को 1,46,511 वोट मिले।
हार का अंतर: 81,903 वोट।

1999, अल्मोड़ा:
बची सिंह रावत को 1,92,388 और हरीश रावत को 1,80,929 वोट मिले।
हार का अंतर: 11,459 वोट।

और आपको याद दिला दूँ की आप कितने बड़े जनाधार के नेता है , 2002 में राज्य में कांग्रेस की सरकार थी , आप प्रदेश अध्यक्ष भी थे और राज्यसभा सांसद भी थे। आप दावा करते है को आप कांग्रेसियों सरकार बनवा सकते है या किसी भी सीट पर किसी भी एनी प्रत्याशी को जितवा सकते है। अब आप ये बताओ आपने 2004 में आप स्वयं अल्मोड़ा लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़े थे क्योंकि आप राज्यसभा सांसद थे इसी के चलते आपने फिर किसी पार्टी के काबिल सिपाही का गला काटा और अपनी पत्नी को कांग्रेस का प्रत्याशी बनवा दिया और उसका नतीजा था:

  • बची सिंह रावत (BJP): 2,25,742 वोट — 44.68%
  • रेणुका रावत (Congress): 2,15,690 वोट — 42.69%
  • ये हार भी आपके खाते में गई थी।
    अब आपको याद दिला दूँ इस चुनाव में केंद्र में UPA की सरकार बनी थी। और आपको याद दिला देता हूँ आपके कितने तथाकथित शागिर्द उस समय पॉवर में थे , गोविंद कुंजवाल, महेंद्र सिंह मेहता मंत्री , प्रदीप टम्टा , रणजीत रावत विधायक सहित एक दर्जन एनी विधायक और इस चुनाव में अपनी जान फूंके थे तब मुँह की खानी पड़ी।

अर्थात जिस अल्मोड़ा सीट से हरीश रावत लगातार तीन बार सांसद बने थे, उसी सीट पर वे इसके बाद लगातार चार लोकसभा चुनाव हार गए।

अब आपको बताता हूँ आपको हरिद्वार द्वारा दिए गए राजनीतिक पुनर्जीवन की कहानी, कौनसा हरिद्वार ? याद है या दिला दूँ , ये वही हरिद्वार है जिसके मंगलौर के राजनीतिक काजी परिवार में आपको हरिद्वार में पनाह दी और आपको पुनर्जीवन राजनीतिक जीवन दिया। अब आपको याद दिलाताहूँ यशपाल आर्य और हरक सिंह रावत का योगदान । उस समय यशपाल आर्य कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और हरक सिंह र्वाता रावत नेता प्रतिपक्ष थे , इनके नेतृत्व में सिर्फ़ हरिद्वार नहीं पांचों लोकसभा सीट जीती गई थी और 2012 में राज्य में कांग्रेस सरकार भी इनके नेतृत्व में ही बनी थी।
इस पूरे प्रकरण को देखे तो कभी ऐसा नहीं हुआ की आप अकेले ही जीते हो , आप सिर्फ जब जीते जब गधे घोड़े सब जीत रहे थे।

2009 में हरीश रावत ने राजनीतिक क्षेत्र बदला और हरिद्वार लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। यहां उन्होंने जीत दर्ज की।

यह तथ्य भी चुनावी रिकॉर्ड का हिस्सा है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसके बाद वे केंद्र सरकार में मंत्री भी बने।

2014 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने धारचूला विधानसभा उपचुनाव लड़ा और बड़े अंतर से जीत हासिल की।

लेकिन इसके बाद फिर हार का एक लंबा सिलसिला दिखाई देता है।

2017: मुख्यमंत्री रहते दो सीटों से चुनाव—दोनों पर हार

2017 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक नहीं बल्कि दो विधानसभा सीटों—हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा—से चुनाव लड़ा।

हरिद्वार ग्रामीण: भाजपा के यतीश्वरानंद से 12,278 वोटों से हार।

किच्छा: भाजपा के राजेश शुक्ला से 2,127 वोटों से हार।

यानी मुख्यमंत्री के रूप में चुनाव लड़ते हुए वे अपनी दोनों सीटें नहीं जीत सके।

2019: राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी हार

2019 में हरीश रावत नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा क्षेत्र से मैदान में उतरे।

भाजपा के अजय भट्ट को लगभग 61.65% और हरीश रावत को लगभग 34.41% वोट मिले।

अजय भट्ट ने उन्हें करीब 3.39 लाख वोटों के विशाल अंतर से पराजित किया।

यह हरीश रावत के चुनावी जीवन की सबसे बड़े अंतर वाली हार थी।

2022: सीट बदली, लेकिन लालकुआं में भी हार

2022 के विधानसभा चुनाव में हरीश रावत लालकुआं से मैदान में उतरे।

भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट को 46,307 वोट मिले जबकि हरीश रावत को 28,780 वोट मिले।

हार का अंतर: 17,527 वोट।

इस तरह 2017 में हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा, 2019 में नैनीताल-ऊधमसिंह नगर और 2022 में लालकुआं—चार लगातार सीट-मुकाबलों में हरीश रावत पराजित हुए।

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अब हरिद्वार में परिवार का चुनावी रिकॉर्ड भी देखिए

मामला केवल हरीश रावत के अपने चुनावों तक सीमित नहीं है।

2009 में जिस हरिद्वार लोकसभा सीट से हरीश रावत स्वयं सांसद बने, उसी सीट पर बाद के वर्षों में उनकी पत्नी और बेटे ने भी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा।

2014: पत्नी रेणुका रावत की हार

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत को हरिद्वार से उम्मीदवार बनाया।

भाजपा के रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को 5,92,320 वोट मिले।

रेणुका रावत को 4,14,498 वोट मिले।

हार का अंतर: 1,77,822 वोट।

यानी जिस हरिद्वार से पांच वर्ष पहले हरीश रावत स्वयं सांसद बने थे, वहां उनकी पत्नी करीब 1.78 लाख वोटों से चुनाव हार गईं।

2024: बेटे वीरेंद्र रावत भी हरिद्वार से मैदान में

दस वर्ष बाद 2024 में कांग्रेस ने इसी हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र से हरीश रावत के बेटे वीरेंद्र रावत को टिकट दिया।

भाजपा के त्रिवेंद्र सिंह रावत को 6,53,808 वोट मिले।

वीरेंद्र रावत को 4,89,752 वोट मिले।

हार का अंतर: 1,64,056 वोट।

वीरेंद्र रावत का वोट शेयर लगभग 37.60% रहा, जबकि विजेता त्रिवेंद्र सिंह रावत को लगभग 50.19% वोट मिले।

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अब आंकड़े एक साथ रखिए

हरीश रावत के स्वयं के प्रत्यक्ष चुनावी मुकाबलों को सीट के हिसाब से गिनें तो तस्वीर यह बनती है:

कुल 14 चुनावी मुकाबले — 5 जीत और 9 हार।

लोकसभा में उन्होंने 9 मुकाबले किए—4 जीते और 5 हारे।

विधानसभा/विधानसभा उपचुनाव के 5 सीट-मुकाबलों में—1 जीत और 4 हार।

उनकी नौ व्यक्तिगत हारों में:

1991 अल्मोड़ा — 29,145 वोट से हार
1996 अल्मोड़ा — 56,906 वोट से हार
1998 अल्मोड़ा — 81,903 वोट से हार
1999 अल्मोड़ा — 11,459 वोट से हार
2017 हरिद्वार ग्रामीण — 12,278 वोट से हार
2017 किच्छा — 2,127 वोट से हार

2014 में हरिद्वार लोकसभा से सीट से नकारे जाने के बाद आप नैनीताल भाग गए , तब आपका हरिद्वार प्रेम कम हो गया था।
वहाँ जाकर आपने को नया रिकॉर्ड बनाया वो ये था कि आप 14 की 14 विधानसभा सीट हार गए थे और एक विशाल रिकॉर्ड मत लगभग 3.39 लाख वोट से हारे।

2022 लालकुआं — 17,527 वोट से हार

यहां ध्यान रहे कि 2017 में उन्होंने एक ही विधानसभा चुनाव में दो अलग-अलग सीटों से मुकाबला किया था, इसलिए सीट-मुकाबलों की गणना में दोनों को अलग गिना गया है।

और हरिद्वार में परिवार के दो अन्य लोकसभा परिणाम जोड़ दें:

2014 — पत्नी रेणुका रावत: 1,77,822 वोट से हार।
2024 — पुत्र वीरेंद्र रावत: 1,64,056 वोट से हार।

सवाल विशेषण का नहीं, चुनावी रिकॉर्ड का है

हरीश रावत का लंबा राजनीतिक कद, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में उनका अनुभव अपनी जगह दर्ज इतिहास है। उनकी शुरुआती तीन अल्मोड़ा लोकसभा जीत, 2009 की हरिद्वार जीत और 2014 की धारचूला उपचुनाव जीत भी उसी रिकॉर्ड का हिस्सा हैं।

लेकिन उसी रिकॉर्ड का दूसरा पक्ष यह भी है कि उन्होंने स्वयं 14 प्रत्यक्ष सीट-मुकाबलों में 9 बार पराजय देखी है।

अल्मोड़ा में लगातार चार लोकसभा हार हुईं।

2017 में मुख्यमंत्री रहते हुए दो विधानसभा सीटों से लड़े और दोनों हारे।

2019 में नैनीताल-ऊधमसिंह नगर से करीब 3.39 लाख वोट से हारे।

2022 में लालकुआं से फिर हार हुई।

और जिस हरिद्वार से वे 2009 में स्वयं सांसद बने थे, वहीं 2014 में उनकी पत्नी और 2024 में उनके बेटे को लोकसभा चुनाव में पराजय मिली।

इसलिए जब उत्तराखंड की राजनीति में “सबसे बड़ा जनाधार” जैसे दावे किए जाएं, तो बहस केवल भाषणों, पदों या राजनीतिक प्रभाव तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

1980 से 2024 तक का यह चुनावी रिकॉर्ड भी सामने रखा जाना चाहिए।

अरे हाँ! चलते चलते एक बात और याद आई, आप बार बार “मेरा विज़न , मेरा विज़िन” करते हो , आपका विज़न कद्दू के अलावा कुछ नहीं है , बताता हूँ कैसे, आप हरिद्वार सांसद थे , केंद्र में पाँच साल कैबिनेट मंत्री रहे , और आप ये दावा भी करते हो कि आपका हरिद्वार से तथाकथित आत्मिक लगाव भी है, बस अब आप ये बताओ की आपको हरिद्वार ने आपको 2017 में विधानसभा चुनाव क्यों हराया? आप इस देश के पहले ऐसे अभागे मुख्यमंत्री रहे जो दो-दो सीट से चुनाव हारे। अच्छा अब आखरी बात ये भी बता दो कि 2024 में आपके होनहार बेटे वीरेंद्र रावत को डेढ़ लाख वोट से जनता ने क्यों नकारा । 2014 मुख्यमंत्री बने , आपके पास विधायक बनने के लिए कोई सीट नहीं थी, आपके करीबी हरीश धामी ने अपनी सीट छोड़ी और ये सोचकर छोड़ी थी कि मेरे अति दुर्गम और पिछड़े क्षेत्र की दशा और दिशा बदलेगी , मकीं बदला कद्दू नहीं , वो बेचारा आज भी सदन में अपने क्षेत्र के अति पिछड़ेपन को लेकर सरकार पर गरजता नजर आता है ।

अब आपके विश्वासघात के किससे बताता हूँ

1 आपने 2012-2022 में अर्येंद्र शर्मा के सामने डम्मी कैंडिडेट लड़ाकर हरवाया।
2 किशोर उपाध्याय को टिहरी से सहसपुर लाकर पटका और हरवाया
और तो और डायन भी सात घर छोड़ती है, आपने तो डायन को भी शर्मिंदा कर दिया ।
आपके लिए जाने लेने और जान देने तक के लिए तैयार रहने वाले रणजीत रावत को सल्ट सीट से रामनगर भेजा और फिर जब उसने अपने पैर रामनगर में जमाए तो सल्ट भेज दिया और बेचारे को हरवा दिया।

4 सेज साले कारण महरा को दो-दो बार हरवाने में आपका सबसे बड़ा हाथ ।

5 आपके विश्वासपात्र दिनेश अग्रवाल, नवप्रभात को हटवाने में आपका नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है ल

6 आपने विजय बहुगुणा, सतपाल महाराज जैसे दिग्गज जनाधार वाले नेताओं को दरकिनार कर एकला चलो अभियान जारी रखते हुए और इन बड़े नेताओं को नीचा दिखाने के लिए आधारहीन नेताओं को राजसभा भेजने तक का काम किया।

7 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले रायपुर सीट से विधायक उमेश काऊ राहुल गांधी से मुलाक़ात करने पहुंच गए थे , आपने उन्हें वहाँ से बदतमीजी करके भगा दिया था , वहाँ से निकलकर वो सीधा बीजेपी के एक बड़े नेता के घर पहुँचा और टिकट लेकर चुनाव लड़ा और 60000 से जीता

8 हरिद्वार ग्रामीण की सीट से एक कांग्रेसी नेता की गर्दन काटकर 2022 में अपनी बेटी को स्थापित करने का काम किया ।

9 अपनी करीबी कांग्रेस की महिला नेत्री की बलि लेकर ख़ुद चुनाव लड़ा और मुँह की खायी।

10 आसान आसान और पंजाब कांग्रेस की आपने प्रभारी रहते हुए ऐसी दुर्दशा कर दी की आज तक सम्भाले नहीं संभल रही ।
जैसे उत्तराखंड में जितने कांग्रेस के दिग्गज नेता थे जैसे की विजय बहुगुणा , सतपाल महाराज , हरक सिंह रावत , यशोल आर्य, सुबोध उनियाल , उमेश काऊ, शैलेंद्र सिंघल , प्रदीप बत्रा और कई अन्य का आपने कांग्रेसी में रहना दूभर कर दिया जिसके चलते सब भाजपा में चले गए , इस पाप के जिम्मेदार भी आप ही हो और इसकी अगली कड़ी में देश का एक बड़ा नाम पंजाब के अमरेंद्र सिंह भी आपको वजह से पार्टी छोड़कर गए।

11 आपने सुबोध उनियाल को 2004 में 3 वोट से हरवाया।

12 अनुसूयन प्रशाद मैखुरी को हरवाया।
13 आपने विजयपाल को उत्तरकाशी से हरवाया।

14 राहुल गांधी के करीबी प्रकाश जोशी को दो विधानसभा और एक लोकसभा चुनाव में नुक़सान पहुंचाया।

15 तिलकराज बेहड को आपने दो चुनाव हरवाये

16 इंदिरा हृदेश जी को आपने चुनाव हरवाया ।
आज भी सुमित के ख़िलाफ़ साज़िशों करते है

17 2012 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में किच्छा कांग्रेस (INC) के उम्मीदवार सरवर यार खान थे। जिसको आपने 8000 वोट से हरवाया और इस से बड़ी बेशर्मी ये थी कि 2017 के चुनाव में इसी मुस्लिम कैंडिडेट का टिकट कटवाकर उसका राजनीतिक कैरीअर ख़त्म करके ख़ुद चुनाव लड़े और हार गए।
अच्छा ये बताओ जब तक हरिद्वार से आपको बड़ा लगाव था तो आप हरिद्वार में एक बड़ी फेमस रोजा इफ्तार पार्टी करते थे, जब से आपकी भाजपा से नज़दीक़याँ बढ़ी और आप पर भगवा रंग चढ़ा तब से आपने ये पार्टियां भी बंद कर दी। अक्सर आप जाली वाली टोपी लगाये दिखते और आए दिन साबिर पाक कलियर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने जाता करते थे , कई साल से आप वहाँ से भी रफूचक्कर है।
तभी तो मैं कहतानहून की गिरगिट और डायन अगर किसी से शर्माते है तो वो आप हो।

अब आपको बताता हूँ कि आप कितने बड़े बेशर्म इंसान है। आपको ED ने पुकारा तो छोटे मासूम बच्चे के जैसे माँ-माँ चिल्लाने लग गए। ये बताओ जब केंद्र मंत्री नेम थे तब माँ के साथ पिक्चर डाल थी उनका आभार प्रकट किया था ? उसके बाद आप मुख्यमत्री नेम क्या तब मैं के साथ पिक्चर डाली थी ? आज माई याद आ रही है।

इसके बाद यह फैसला उत्तराखंड की जनता स्वयं करे कि चुनावी जनाधार की तस्वीर इन आंकड़ों से क्या बनती है।