उत्तराखंड में हजारों बीपीएड और एमपीएड प्रशिक्षित युवा वर्षों से रोजगार की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उत्तराखंड बीपीएड बेरोजगार संगठन का कहना है कि यदि राज्य में शारीरिक शिक्षकों की आवश्यकता नहीं थी, तो आखिर इतने बीपीएड कॉलेज क्यों खोले गए और हर वर्ष हजारों विद्यार्थियों को यह डिग्री लेने के लिए क्यों प्रोत्साहित किया गया?
संगठन का आरोप है कि एक ओर राज्य सरकार “फिट इंडिया”, “खेलो इंडिया” और खेलों को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा विषय लागू होने के बावजूद शारीरिक शिक्षा शिक्षकों की नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं। जब प्रत्येक विषय के लिए अलग शिक्षक नियुक्त किए जाते हैं, तो शारीरिक शिक्षा की कक्षाएं कौन संचालित कर रहा है और बच्चों को खेल प्रशिक्षण कौन दे रहा है, यह एक बड़ा सवाल है।
विशेष रूप से पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक युवाओं ने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बीपीएड और एमपीएड की पढ़ाई पूरी की। कई परिवारों ने अपनी जमीन-जायदाद तक बेचकर बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी नियुक्तियां न होने के कारण हजारों प्रशिक्षित युवा बेरोजगार हैं। संगठन के अनुसार राज्य में बीपीएड डिग्रीधारकों की संख्या 20,000 से अधिक है, जिनमें लगभग 8,000 अभ्यर्थी आयु सीमा पार कर चुके हैं।
बेरोजगार युवाओं का कहना है कि यदि शारीरिक शिक्षा विषय को विद्यालयों में अनिवार्य रूप से लागू किया गया है, तो उसके लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति भी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। उत्तराखंड देश का पहला राज्य माना जाता है जिसने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को तेजी से लागू किया और प्राथमिक से इंटरमीडिएट स्तर तक शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य विषय बनाया, लेकिन आज तक इस विषय के लिए पर्याप्त शिक्षकों की भर्ती नहीं की गई।
संगठन का यह भी आरोप है कि सरकार द्वारा संचालित विभिन्न खेल योजनाओं का लाभ ग्रामीण क्षेत्रों तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। खेल मंत्री द्वारा संचालित “उदीयमान खिलाड़ी उन्नयन योजना” जैसी योजनाओं में भी अपेक्षाकृत अधिक लाभ शहरी और अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों के विद्यार्थियों को मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चे संसाधनों और प्रशिक्षण सुविधाओं के अभाव में पीछे रह जाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के पास प्राकृतिक वातावरण, बेहतर शारीरिक क्षमता और खेल प्रतिभा होने के बावजूद उन्हें न तो पर्याप्त प्रशिक्षक मिल रहे हैं और न ही आधुनिक खेल सुविधाएं। परिणामस्वरूप अनेक प्रतिभाएं शुरुआती स्तर पर ही अवसरों के अभाव में दम तोड़ देती हैं।
बीपीएड-एमपीएड प्रशिक्षित बेरोजगार युवाओं का कहना है कि केवल योजनाओं की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत है कि सरकार धरातल पर कार्य करे, विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा शिक्षकों के रिक्त पदों का आकलन करे और शीघ्र भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ करे। इससे न केवल हजारों बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिलेगा बल्कि राज्य के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण खेल शिक्षा और प्रशिक्षण भी प्राप्त होगा।
आज उत्तराखंड का प्रत्येक बीपीएड एवं एमपीएड प्रशिक्षित बेरोजगार सरकार से यही प्रश्न पूछ रहा है कि जब राज्य में खेलों को बढ़ावा देने की बात की जाती है, तो फिर शारीरिक शिक्षा के प्रशिक्षित युवाओं की उपेक्षा क्यों की जा रही है? आखिर उनकी वर्षों की मेहनत, शिक्षा और संघर्ष का उत्तरदायित्व कौन लेगा?
राज्य सरकार को चाहिए कि वह इस गंभीर विषय पर शीघ्र निर्णय लेते हुए शारीरिक शिक्षा शिक्षकों की नियुक्तियों का मार्ग प्रशस्त करे, ताकि खेल, शिक्षा और रोजगार—तीनों क्षेत्रों को एक साथ मजबूती मिल सके।

