“धामी हटेंगे” वालों का अब BP शुगर हाई है!

by | May 23, 2026

उत्तराखंड की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा “मानसिक तनाव” अगर किसी को है, तो वो विपक्ष को नहीं…बल्कि उन नेताओं को है जिन्होंने पिछले दो साल सिर्फ एक ही साधना की “धामी हटेंगे… धामी हटेंगे…” 😄

लेकिन राजनीति भी बड़ी क्रूर गुरुमाता है साहब…यहाँ कई लोग “आम के आम, गुठलियों के दाम” सोचकर निकले थे, और अब हालत ये है कि ना आम मिले, ना गुठलियाँ। 😄

एक पुरानी चौपाई याद आती है

“जाके राखे दिल्ली दरबार,
उसे न डिगा सके अखबार।” 😄

देहरादून से दिल्ली तक कुछ राजनीतिक ज्योतिषियों ने इतनी बार मुख्यमंत्री बदल दिया कि जनता कहने लगी “भाई साहब, ये सरकार है या IPL की कप्तानी?” 😄

सुबह खबर उड़ती “दिल्ली नाराज़…”
दोपहर में “संगठन चिंतित…”
और शाम को धामी जी नई सड़क, नई योजना या नई निवेश नीति लॉन्च कर देते। 😄

कुछ नेताओं की हालत अब वैसी हो चुकी है जैसे गाँव का वो फूफा जी, जो हर शादी में कहते हैं “ये रिश्ता मैंने करवाया था…”
और बाद में पता चलता है कि उन्हें कार्ड ही व्हाट्सऐप पर मिला था। 😄

राजनीति में एक कहावत है “खाली बर्तन ज्यादा बजते हैं।
“उत्तराखंड में पिछले दो साल कुछ लोग सिर्फ बर्तन ही बजाते रहे।कोई दिल्ली दौड़ रहा था, कोई लॉबी कर रहा था, चंद दरबारी मीडिया वाले मीडिया में “सूत्रों” का कारखाना चला रहे थे और सोशल मीडिया पर ज्ञानी पत्रकार बने थे।

लेकिन धामी जी की राजनीति “धीमी आँच की दाल” निकली , समय तो लगा पर स्वाद अद्भुत

“रोज़ रचें जो तख़्त की माया,
उनका सपना धरा रह जाया।
जो चुपचाप करे व्यवहार,
वही टिके दरबार-दरबार।” 😄

अब हालत ये है कि जो लोग हर सोमवार मुख्यमंत्री बदल देते थे, वो आजकल फेसबुक पर लिख रहे हैं , “माननीय मुख्यमंत्री जी के कुशल नेतृत्व में…” 😄
इसे ही राजनीति में कहते हैं “थूक कर चाटना।”

एक नेता जी इतने आत्मविश्वास में थे कि उन्होंने समर्थकों से कह दिया “तैयारी करो…”
समर्थकों ने भी बायो बदल दिया “भावी मंत्री समर्थक।🤣 अब बेचारे फिर से “समाजसेवी” लिखकर घूम रहे हैं।

उत्तराखंड की राजनीति में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें हर फोटो में अपना भविष्य दिखता है।
दिल्ली में किसी बड़े नेता के साथ फोटो खिंचवा ली नहीं कि अगले दिन समर्थक लिख देते हैं “उत्तराखंड में बड़ा बदलाव तय!”
अरे भाई, कभी-कभी आदमी दिल्ली सिर्फ समोसा खाने भी चला जाता है। 😄

एक पहाड़ी कहावत बिल्कुल फिट बैठती है
“पहाड़ की चाल और राजनीति की ढाल,
धीरे समझ आती है हर साल।”

सबसे मजेदार दृश्य अब दिखता है।
जो लोग अंदरखाने “धामी हटाओ” बैठक कर रहे थे, वही अब मंच पर सबसे आगे बैठकर ताली बजाते हैं। 😄 राजनीति में इसे कहते हैं “साँप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे।”

“जो दिन-रैन बदलवा चाहें,
कुर्सी के सपने ही गाहें।
जनता बोली धीरे-धीरे,
अब बस करो महाराज जी रे…” 😄

असल बात ये है कि उत्तराखंड अब प्रयोगों से थक चुका है।जनता समझ गई है कि हर छह महीने में मुख्यमंत्री बदलने से विकास नहीं होता, सिर्फ सरकारी बोर्ड बदलते हैं।

फिलहाल राजनीति का हाल ऐसा है

“धामी चलते रहे मुस्काकर,
विरोधी जलते रहे बड़बड़ाकर।” 😄

बाकी राजनीति है साहब…
यहाँ सुबह जो व्यक्ति “गोपनीय बैठक” कर रहा होता है,
शाम को वही ट्वीट करता है “माननीय मुख्यमंत्री जी के दूरदर्शी नेतृत्व में उत्तराखंड प्रगति कर रहा है।” 😄