25 साल का उत्तराखंड: सरकारें बदलती रहीं, घोटालों के किरदार बदलते रहे… व्यवस्था नहीं बदली?
उत्तराखंड आंदोलनकारियों ने शायद कभी कल्पना नहीं की होगी कि जिस राज्य के लिए उन्होंने लाठियां खाईं, गोलियां झेलीं और शहादत दी—एक दिन उसी राज्य में गरीब बच्चे की छात्रवृत्ति से लेकर बेरोजगार नौजवान के प्रश्नपत्र तक पर भ्रष्टाचार के आरोप लगेंगे।
राज्य बना था पहाड़ का भविष्य बदलने के लिए।
लेकिन 25 साल बाद उत्तराखंड को अपनी राजनीतिक आत्मा से एक कड़वा सवाल पूछना चाहिए—
उत्तराखंड बना किसके लिए था और इन 25 वर्षों में फायदा किसका हुआ?
सरकारें बदलीं।
मुख्यमंत्री बदले।
मंत्री बदले।
अधिकारी बदले।
घोटालों के नाम बदले।
लेकिन हर कुछ वर्षों बाद अखबार की हेडलाइन लगभग वही रही—
“घोटाला सामने आया… जांच बैठी… SIT बनी… आरोपी गिरफ्तार… मामला अदालत में…”
और फिर उत्तराखंड किसी अगले घोटाले की हेडलाइन पढ़ने लगा।
कभी जमीन, कभी छात्रवृत्ति, कभी भर्ती और कभी बीमारी तक में खेल!
उत्तराखंड के भ्रष्टाचार की कहानी किसी एक विभाग तक सीमित नहीं रही।
NH-74 भूमि अधिग्रहण मामला सामने आया तो आरोप था कि जमीन के मुआवजे में भारी अनियमितताएं हुईं।
SC/ST छात्रवृत्ति घोटाला सामने आया तो गरीब और वंचित बच्चों की पढ़ाई के लिए भेजे गए सरकारी धन में फर्जी छात्रों और संस्थानों के जरिए हेराफेरी के आरोप लगे।
UKSSSC पेपर लीक हुआ तो बेरोजगार युवाओं का भरोसा टूटा।
उसके बाद पटवारी-लेखपाल भर्ती परीक्षा का प्रश्नपत्र भी लीक हो गया।
और कोरोना जैसी महामारी के बीच हरिद्वार कुंभ में फर्जी कोविड टेस्ट का मामला सामने आया।
जरा सोचिए—
जिस प्रदेश में छात्रवृत्ति भी सुरक्षित नहीं, परीक्षा का प्रश्नपत्र भी सुरक्षित नहीं और महामारी में होने वाली जांच भी सुरक्षित नहीं—वहां आखिर सुरक्षित क्या है?
NH-74: जमीन गई, मुआवजा आया और सिस्टम पर सवाल खड़े हो गए
2017 में सामने आए NH-74 भूमि अधिग्रहण मामले में 2011 से 2016 के बीच मुआवजा वितरण में करोड़ों रुपये की कथित अनियमितताओं की बात सामने आई।
जमीन का वर्गीकरण बदलकर मुआवजा बढ़ाने जैसे आरोप लगे।
अधिकारी निलंबित हुए।
जांच हुई।
लेकिन आम उत्तराखंडी के मन में एक सवाल रह गया—
क्या बिना सिस्टम के भीतर मजबूत गठजोड़ के सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये का खेल संभव है?
भ्रष्टाचार में केवल वह हाथ दोषी नहीं होता जो पैसा उठाता है।
वह आंख भी जिम्मेदार है जो सब देखकर बंद रहती है।
छात्रवृत्ति घोटाला: गरीब के हिस्से का पैसा भी नहीं छोड़ा?
उत्तराखंड के सबसे शर्मनाक मामलों में SC/ST पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति प्रकरण को गिना जाएगा।
यह पैसा किसके लिए था?
उस बच्चे के लिए जिसके माता-पिता महंगी पढ़ाई नहीं करा सकते।
उस दलित और आदिवासी छात्र के लिए जिसे सरकार शिक्षा के जरिए आगे बढ़ाना चाहती थी।
लेकिन जांच और अदालतों तक पहुंचे मामलों में फर्जी या अपात्र छात्रों तथा संस्थानों के जरिए सरकारी धन निकालने के आरोप सामने आए।
2026 तक ED की कार्रवाई जारी है और करोड़ों रुपये की संपत्तियां अटैच की जा चुकी हैं।
भ्रष्टाचार की इससे ज्यादा क्रूर तस्वीर क्या होगी कि गरीब बच्चे के नाम पर आया पैसा भी व्यवस्था में सुरक्षित न रहे?
यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं है।
यह किसी गरीब बच्चे के भविष्य पर डाका है।
फिर उत्तराखंड के नौजवान के सपनों की बोली लगी
उत्तराखंड का बेरोजगार नौजवान वर्षों तक तैयारी करता है।
पिता खेत बेचता है।
मां गहने गिरवी रखती है।
बच्चा देहरादून में कमरा लेकर किताबें पढ़ता है।
और फिर एक सुबह खबर आती है—
पेपर लीक हो गया।
UKSSSC पेपर लीक प्रकरण ने राज्य को हिलाकर रख दिया।
और जब जनता अभी उसका दर्द भूल भी नहीं पाई थी, 2023 में पटवारी-लेखपाल भर्ती परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने का मामला सामने आ गया।
50 हजार से ज्यादा अभ्यर्थी 563 पदों के लिए परीक्षा में बैठे थे।
सोचिए उस बच्चे पर क्या गुजरी होगी जिसने दो साल ईमानदारी से तैयारी की और बाद में पता चला कि जिस प्रश्नपत्र को वह अपनी मेहनत से हल कर रहा था, उसे कथित तौर पर कुछ लोगों ने पहले ही हासिल कर लिया था।
पेपर लीक होना सिर्फ परीक्षा का अपराध नहीं है।
यह मेहनत की हत्या है।
योग्यता का अपमान है।
और सरकार पर नौजवान के भरोसे की हत्या है।
हद तो तब हुई जब बीमारी भी कारोबार बन गई
2021।
कोरोना से लोग मर रहे थे।
परिवार अस्पतालों के बाहर खड़े थे।
देश ऑक्सीजन के लिए परेशान था।
उसी दौर में हरिद्वार कुंभ के कोविड परीक्षणों में बड़े पैमाने पर फर्जी जांच का मामला सामने आया।
जांच में करीब एक लाख टेस्ट रिपोर्ट फर्जी होने की बात सामने आई।
2025 में ED ने इस मामले में 14 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की।
अब सवाल यह है—
अगर महामारी में भी फर्जीवाड़े की गुंजाइश खोज ली जाए तो भ्रष्टाचार को और कितना नीचे गिरना बाकी है?
आपदा में सामान्य इंसान सेवा खोजता है।
भ्रष्ट तंत्र अगर उसमें अवसर खोजने लगे तो वह केवल भ्रष्टाचार नहीं रह जाता—
वह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा बन जाता है।
और ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं…
CAG की रिपोर्टों में वर्षों से सरकारी कामों में अनियमितताओं, अतिरिक्त भुगतान और कमजोर निगरानी पर सवाल उठते रहे हैं।
2010 की CAG रिपोर्ट में SIDCUL के कामकाज में ₹15.08 करोड़ के अधिक भुगतान का उल्लेख हुआ और विभागीय अधिकारियों की निगरानी की जिम्मेदारी पर भी गंभीर टिप्पणी की गई।
इसलिए उत्तराखंड की समस्या केवल यह नहीं है कि घोटाले हुए।
असली समस्या है—
हर घोटाले के बाद सिस्टम कुछ दिन जागता है और फिर सो क्यों जाता है?
भाजपा भी जवाब दे, कांग्रेस भी जवाब दे
यह लेख किसी एक पार्टी के लिए नहीं है।
उत्तराखंड के इन 25 वर्षों में कांग्रेस ने भी सरकार चलाई।
भाजपा ने भी सरकार चलाई।
मुख्यमंत्री आते-जाते रहे।
इसलिए भ्रष्टाचार पर कोई भी राजनीतिक दल दूध का धुला होने का प्रमाणपत्र खुद को नहीं दे सकता।
कांग्रेस भाजपा के समय के घोटाले गिनाती है।
भाजपा कांग्रेस के समय के घोटाले गिनाती है।
लेकिन उत्तराखंड की जनता दोनों से पूछ सकती है—
“आप दोनों एक-दूसरे के घोटाले तो गिनाते रहे, उत्तराखंड से घोटाले खत्म किसने किए?”
यही सवाल सबसे ज्यादा चुभता है।
उत्तराखंड में सबसे ताकतवर विभाग कौन-सा है—‘जांच विभाग’?
घोटाला हुआ—
जांच बैठा दो।
जनता नाराज हुई—
SIT बना दो।
मामला बड़ा हुआ—
CBI की मांग कर दो।
फाइल खुली।
कुछ गिरफ्तारियां हुईं।
कुछ निलंबन हुए।
फिर साल गुजरते
कुछ निलंबन हुए।
फिर साल गुजरते गए।
यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि पिछले 25 वर्षों के बड़े भ्रष्टाचार मामलों में—
कितने दोषियों को अंतिम सजा हुई?
कितनी पूरी रकम सरकारी खजाने में वापस आई?
कितने बड़े अधिकारियों की संपत्ति जब्त हुई?
और कितने मामलों में राजनीतिक जिम्मेदारी तय हुई?
इन सवालों के उत्तर सार्वजनिक होने चाहिए।
भ्रष्टाचार की कीमत रुपये में मत गिनिए
जब सड़क में भ्रष्टाचार होता है तो कीमत सिर्फ करोड़ रुपये नहीं होती—
किसी दिन वही कमजोर सड़क किसी की जान ले सकती है।
भर्ती में भ्रष्टाचार होता है तो कीमत केवल रिश्वत नहीं होती—
किसी योग्य नौजवान की उम्र निकल जाती है।
छात्रवृत्ति में भ्रष्टाचार होता है तो सरकारी खजाना ही नहीं लुटता—
किसी गरीब बच्चे की शिक्षा छिनती है।
स्वास्थ्य में भ्रष्टाचार होता है तो फाइल नहीं—
जिंदगी दांव पर लगती है।
इसीलिए भ्रष्टाचार आर्थिक अपराध से आगे बढ़कर सामाजिक अपराध बन जाता है।
उत्तराखंड छोटा प्रदेश है, फिर भ्रष्टाचार इतना बड़ा कैसे हो गया?
सवा करोड़ के आसपास आबादी वाला छोटा राज्य।
70 विधानसभा सीटें।
13 जिले।
इतने छोटे राज्य में सरकार और प्रशासन के लिए निगरानी अपेक्षाकृत आसान होनी चाहिए।
फिर भी बार-बार बड़े मामले सामने आते हैं।
क्यों?
क्या राजनीतिक संरक्षण भ्रष्टाचार से ज्यादा ताकतवर है?
क्या ईमानदार अधिकारी व्यवस्था में अकेला पड़ जाता है?
क्या ठेकेदार-अधिकारी-राजनीति का गठजोड़ इतना मजबूत हो चुका है कि सरकार बदलने के बाद चेहरे बदल जाते हैं लेकिन नेटवर्क बचा रहता है?
इन सवालों से भागकर उत्तराखंड भ्रष्टाचार से नहीं लड़ सकता।
25 साल बाद एक हिसाब होना चाहिए
अब उत्तराखंड को एक “25 साल का भ्रष्टाचार श्वेतपत्र” चाहिए।
2000 से आज तक सामने आए सभी बड़े भ्रष्टाचार मामलों की सूची सार्वजनिक हो।
कितनी रकम का आरोप था?
FIR कब हुई?
जांच किस एजेंसी ने की?
चार्जशीट हुई या नहीं?
कितनी संपत्ति जब्त हुई?
मामला अदालत में कहां तक पहुंचा?
कौन दोषी साबित हुआ?
कौन बरी हुआ?
और सरकारी पैसा कितना वापस आया?
जनता को केवल घोटाले की Breaking News नहीं, उसका अंतिम परिणाम भी जानने का अधिकार है।
राज्य आंदोलनकारियों से एक बार नजर मिलाकर देखिए
उत्तराखंड सचिवालय की शानदार इमारतों में बैठकर एक बार उन आंदोलनकारियों की तस्वीर देखिए जिन्होंने इस राज्य के लिए संघर्ष किया था।
और खुद से पूछिए—
क्या उन्होंने ऐसा उत्तराखंड मांगा था?
जहां नौकरी की परीक्षा का पेपर बिकने के आरोप लगें?
जहां गरीब की छात्रवृत्ति में घोटाला हो?
जहां जमीन के मुआवजे पर सवाल उठें?
जहां महामारी में फर्जी जांच हो?
नहीं।
उन्होंने छोटा राज्य इसलिए मांगा था कि सरकार जनता के करीब होगी।
लेकिन अगर छोटे राज्य में भी भ्रष्टाचार आम आदमी से ज्यादा ताकतवर हो जाए तो राज्य छोटा होने का फायदा क्या हुआ?
25 साल में बहुत कुछ बना… अब ईमानदार व्यवस्था बनानी बाकी है
सड़कें बनीं।
पुल बने।
सचिवालय बना।
विधानसभा बनी।
बड़े-बड़े भवन बने।
नेताओं की पीढ़ियां तैयार हो गईं।
अफसरों की पीढ़ियां रिटायर हो गईं।
लेकिन एक चीज आज भी निर्माणाधीन दिखाई देती है—
भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा सिस्टम, जिससे बड़ा आदमी भी डरे।
उत्तराखंड को अब भाषण नहीं चाहिए।
समयबद्ध जांच चाहिए।
समयबद्ध मुकदमा चाहिए।
दोषी की संपत्ति जब्त होनी चाहिए।
लूटा हुआ पैसा वापस आना चाहिए।
और राजनीतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
क्योंकि भ्रष्टाचार का कोई धर्म नहीं होता।
कोई जाति नहीं होती।
कोई पार्टी नहीं होती।
भ्रष्टाचार की केवल एक पहचान होती है—वह जनता का पैसा खाता है।
और 25 साल बाद उत्तराखंड को अपनी सत्ता से सिर्फ एक सवाल पूछना चाहिए—
“प्रदेश तो हमने आपको चलाने के लिए दिया था… लूटने के लिए कब दे दिया?”
जिस दिन उत्तराखंड की जनता यह सवाल पार्टी देखकर नहीं, हर सत्ता से पूछना शुरू कर देगी, शायद उसी दिन उस उत्तराखंड का निर्माण शुरू होगा, जिसके लिए हमारे लोगों ने आंदोलन किया था।

