उत्तराखंड के नेता जबान को लगाम दें कृपया

by | Jun 4, 2026

राजनीति में बयान देना कोई नई बात नहीं है। नेता बोलते हैं, जनता सुनती है, मीडिया चलाता है और सोशल मीडिया उस पर अपनी अलग-अलग प्रतिक्रियां देता है, लेकिन कुछ बयान ऐसे होते हैं जो केवल राजनीतिक नहीं रहते, बल्कि पूरे प्रदेश की छवि पर असर डालते हैं।

हाल ही में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि “युवक नशे में डूब रहे हैं, अपराध इतना बढ़ गया है कि घर से निकलने के बाद शाम को घर वापस आएंगे या नहीं, इसका पता नहीं।”

अगर यह बात किसी अपराध प्रभावित राज्य के बारे में कही जाती तो शायद लोग सामान्य राजनीतिक बयान मान लेते। लेकिन जब यह बात देवभूमि उत्तराखंड के बारे में कही जाती है, तो सवाल उठता है कि आखिर इसका संदेश बाहर क्या जाएगा?

उत्तराखंड कोई युद्धग्रस्त इलाका नहीं है। यह वही प्रदेश है जहाँ करोड़ों श्रद्धालु चारधाम यात्रा के लिए आते हैं, जहाँ देश-विदेश के पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य देखने आते हैं, जहाँ निवेश लाने के लिए सरकारें लगातार प्रयास करती हैं। ऐसे में यदि वरिष्ठ नेता ही यह संदेश दें कि “शाम को घर लौटना भी तय नहीं है”, तो निवेशक क्या सोचेंगे? पर्यटक क्या सोचेंगे? और सबसे बड़ा सवाल — प्रदेश के युवाओं के बारे में देश क्या सोचेगा?

राजनीति में विरोध कीजिए, सरकार को घेरिए, कमियों को उजागर कीजिए — यह लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन ऐसा चित्र मत खींचिए कि लगे मानो उत्तराखंड में हर गली के मोड़ पर अपराधी खड़े हैं और हर दूसरा युवक नशे में डूबा हुआ है।

एक पुरानी कहावत है —

“अपने घर की दीवार में दरार हो तो उसे ठीक करो, मोहल्ले में ढिंढोरा मत पीटो।”

समस्याएँ हैं, यह सच है। नशा भी एक चुनौती है, बेरोज़गारी भी चिंता का विषय है, अपराध भी होते हैं। लेकिन क्या पूरा उत्तराखंड केवल इन्हीं बातों से पहचाना जाएगा?

अगर उत्तराखंड के युवाओं की बात करें तो यही युवा सेना में भर्ती होकर देश की सीमाएँ बचा रहे हैं। यही युवा UPSC, PCS और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर रहे हैं। यही युवा स्टार्टअप खड़े कर रहे हैं, खेलों में प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। कुछ लोग गलत रास्ते पर जा सकते हैं, लेकिन उससे पूरी पीढ़ी को कटघरे में खड़ा कर देना न्याय नहीं है।

राजनीति में कभी-कभी ऐसा लगता है कि कुछ नेता प्रदेश की तस्वीर दिखाने के बजाय उसकी एक्स-रे रिपोर्ट लेकर घूम रहे हैं। जहाँ देखो वहीं बीमारी, वहीं संकट, वहीं निराशा। मानो उत्तराखंड नहीं, कोई हॉलीवुड की अपराध फिल्म चल रही हो।

एक और कहावत याद आती है —

“कुआँ खुद ही अपने पानी को ज़हर बताए, तो प्यासा भी दूर भाग जाता है।”

वरिष्ठ नेताओं की बातों का वजन होता है। उनके शब्द केवल समाचार नहीं बनते, वे धारणा बनाते हैं। इसलिए जब भी उत्तराखंड के बारे में बोलें, तो आलोचना करें लेकिन संतुलन के साथ। कमियाँ बताइए, समाधान सुझाइए, सरकार को आइना दिखाइए — लेकिन ऐसा चित्र मत बनाइए जिससे पूरी दुनिया को लगे कि देवभूमि भय और अराजकता का प्रदेश बन चुकी है।

उत्तराखंड में चुनौतियाँ हैं, लेकिन उसकी पहचान चुनौतियाँ से लड़ना हैं।

उत्तराखंड की पहचान हैं , केदारनाथ की घंटियाँ, बद्रीनाथ की आस्था, सैनिकों का शौर्य, युवाओं की मेहनत, पहाड़ की सादगी और यहाँ की संस्कृति।

राजनीति आती-जाती रहेगी, सरकारें बदलती रहेंगी, बयान भी बदलते रहेंगे।

लेकिन याद रखिए —

“जब नेता प्रदेश की प्रतिष्ठा पर चोट करते हैं, तो नुकसान सरकार का नहीं, पूरे उत्तराखंड का होता है।”

और सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे बयान केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहते। कुछ समय पहले ऋषिकेश में हरियाणा के दो युवकों के साथ हुए एक विवाद के बाद सोशल मीडिया पर उत्तराखंड और हरियाणा के लोग आमने-सामने आ गए थे। दोनों राज्यों के बीच अनावश्यक बहस और कटुता का माहौल बन गया था। बड़ी मुश्किल से वह विवाद शांत हुआ।

लेकिन जब उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री जैसे वरिष्ठ नेता स्वयं यह कहें कि युवा नशे में डूब रहे हैं और अपराध इतना बढ़ गया है कि शाम को घर लौटने की भी गारंटी नहीं, तो ऐसे बयान उन लोगों के हाथ में नया हथियार दे देते हैं जो पहले से ही उत्तराखंड की छवि पर सवाल उठाने का मौका तलाशते रहते हैं।

आज हरियाणा और अन्य राज्यों के कई यूट्यूबर्स तथा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स इन बयानों को उठाकर पूरे उत्तराखंड को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करेंगे। वे कहेंगे कि यह बात कोई विरोधी नहीं, बल्कि राज्य का पूर्व मुख्यमंत्री कह रहा है। फिर चाहे वास्तविकता कुछ भी हो, नुकसान उत्तराखंड की छवि का होगा।

राजनीतिक बयान कुछ घंटों की सुर्खियाँ बनाते हैं, लेकिन उनकी गूँज वर्षों तक सुनाई देती है। इसलिए उत्तराखंड के नेताओं को समझना होगा कि वे केवल किसी सरकार या दल पर टिप्पणी नहीं कर रहे होते, बल्कि उनके शब्द पूरे प्रदेश की प्रतिष्ठा, पर्यटन, निवेश और करोड़ों उत्तराखंडवासियों के सम्मान को प्रभावित करते हैं।

विरोध कीजिए, आलोचना कीजिए, सरकार को आइना दिखाइए — लेकिन ऐसा अवसर मत दीजिए कि बाहर बैठे लोग देवभूमि उत्तराखंड को बदनाम करने का अभियान चला सकें।

ख़ासतौर पर बयान देने वाले अधिकतर नेता वही है जो राहुल गांधी के विदेश में बयान देने पर देश की बेइज्जती करने का रोना रोते है। “आप करे तो रासलीला और राहुल गांधी करे तो करैक्टर ढीला”

“राजनीति की लड़ाई देहरादून में लड़ी जाती है, लेकिन उसके शब्दों की गूँज दिल्ली, मुंबई, हरियाणा और पूरी दुनिया तक जाती है। इसलिए बोलिए जरूर, लेकिन उत्तराखंड के सम्मान को साथ लेकर बोलिए।”