9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड बना था।
आंदोलनकारियों के सपनों में एक ऐसा छोटा राज्य था जहां सरकार जनता के करीब होगी, पहाड़ के गांव बचेंगे, नौजवान को रोजगार मिलेगा, प्राकृतिक संसाधनों पर प्रदेश का अधिकार होगा और भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।
लेकिन 25 वर्षों के बाद मुख्यमंत्री निवास के दरवाजे पर लगी नेमप्लेट कई बार बदली, सरकारें बदलीं, पार्टियां बदलीं और नारे बदले—मगर उत्तराखंड के सामने आज भी एक सवाल खड़ा है:
इन मुख्यमंत्रियों में किसने उत्तराखंड को बनाया, किससे गलतियां हुईं और किसके कार्यकाल पर भ्रष्टाचार या विवादों की सबसे गहरी छाया पड़ी?
आइए बिना भाजपा-कांग्रेस का चश्मा लगाए हर मुख्यमंत्री का हिसाब देखें।
- नित्यानंद स्वामी
कार्यकाल: 9 नवंबर 2000 – 29 अक्टूबर 2001
नए राज्य के पहले मुख्यमंत्री होने के कारण नित्यानंद स्वामी के सामने सबसे बड़ी चुनौती विकास की बड़ी परियोजनाएं शुरू करने से पहले राज्य की प्रशासनिक नींव खड़ी करना थी।
उत्तर प्रदेश से अलग हुए प्रदेश को सचिवालय, विभाग, अधिकारियों और शासन की नई व्यवस्था चाहिए थी। देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाकर नई प्रशासनिक मशीनरी खड़ी करने की प्रक्रिया इसी दौर में शुरू हुई।
सकारात्मक पक्ष
उनका सबसे बड़ा योगदान यही माना जाना चाहिए कि अत्यंत सीमित संसाधनों और संक्रमणकाल में नए राज्य की शासन व्यवस्था को चलाया।
कमजोरी
राज्य आंदोलन की भावना और नई सरकार के बीच अपेक्षित भावनात्मक जुड़ाव नहीं बन पाया। गैरसैंण बनाम देहरादून राजधानी का प्रश्न भी शुरुआती दिनों से ही असंतोष का कारण बना रहा।
उनका कार्यकाल इतना छोटा था कि किसी दीर्घकालीन विकास मॉडल की छाप छोड़ना संभव नहीं हुआ।
भ्रष्टाचार
उनके व्यक्तिगत स्तर पर कोई ऐसा बड़ा स्थापित भ्रष्टाचार प्रकरण सामने नहीं आता जो बाद के कुछ मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल की तरह उनकी राजनीतिक पहचान से जुड़ गया हो।
निष्कर्ष:
स्वामी को विकास के बड़े अध्याय से ज्यादा उत्तराखंड की प्रशासनिक किताब का पहला पन्ना लिखने वाले मुख्यमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।
- भगत सिंह कोश्यारी
कार्यकाल: 30 अक्टूबर 2001 – 1 मार्च 2002
कोश्यारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तब मिली जब पहली विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीने बाकी थे।
चार महीने के आसपास के छोटे कार्यकाल में उनसे किसी बड़े विकास मॉडल की अपेक्षा करना भी उचित नहीं होगा।
सकारात्मक पक्ष
संगठनात्मक पकड़, उत्तराखंड आंदोलन से जुड़ाव और पहाड़ की सामाजिक-राजनीतिक समझ उनकी ताकत रही।
कमजोरी
सरकार मूलतः चुनावी संक्रमणकाल में थी। इसलिए उनके नाम से कोई ऐसी बड़ी प्रशासनिक या आर्थिक नीति नहीं जुड़ सकी जिसने अगले दशक का उत्तराखंड बदल दिया हो।
भ्रष्टाचार
उनके छोटे मुख्यमंत्री कार्यकाल से जुड़ा कोई बड़ा व्यक्तिगत भ्रष्टाचार प्रकरण राजनीतिक इतिहास में प्रमुख रूप से स्थापित नहीं हुआ।
निष्कर्ष:
कोश्यारी का मुख्यमंत्री काल उत्तराखंड के इतिहास में एक लंबी सरकार से अधिक दो चुनावी व्यवस्थाओं के बीच का संक्रमणकाल रहा।
- नारायण दत्त तिवारी
कार्यकाल: 2 मार्च 2002 – 7 मार्च 2007
अगर उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों को केवल आर्थिक और औद्योगिक विकास के आधार पर आंका जाए तो नारायण दत्त तिवारी का नाम सबसे ऊपर की पंक्ति में रखना पड़ेगा।
वे उत्तराखंड के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री थे और लंबे समय तक अकेले मुख्यमंत्री रहे जिन्होंने विधानसभा का पूरा पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा किया।
सबसे बड़ा योगदान—औद्योगिक उत्तराखंड
तिवारी सरकार के दौरान SIDCUL और औद्योगिक क्षेत्रों के विस्तार ने हरिद्वार, पंतनगर-रुद्रपुर और आसपास के मैदानी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था बदल दी।
2003 के केंद्रीय औद्योगिक पैकेज का लाभ उठाकर उनकी सरकार ने बड़ी कंपनियों को उत्तराखंड की ओर आकर्षित किया। बाद के वर्षों में टाटा मोटर्स, बजाज, डाबर, ब्रिटानिया सहित अनेक कंपनियों की मौजूदगी ने औद्योगिक अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। (Business Standard)
अच्छे काम
औद्योगिक निवेश, SIDCUL, सड़क और आधारभूत ढांचे का विस्तार तथा रोजगार के नए अवसर उनके कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियां मानी जाती हैं।
लेकिन इसी विकास मॉडल की सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि उद्योग और आर्थिक गतिविधियां मुख्यतः देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्रों में केंद्रित होती गईं। पहाड़ के गांवों में रोजगार का वैसा मॉडल नहीं पहुंच पाया।
भ्रष्टाचार और विवाद
यहीं तिवारी युग की दूसरी तस्वीर सामने आती है।
2007 में आई भाजपा सरकार ने तिवारी शासन के दौरान कथित अनियमितताओं की जांच के लिए आर.ए. शर्मा आयोग बनाया था। उस समय राजनीतिक रूप से “56 घोटालों” का आरोप खूब चर्चित हुआ। आयोग से जुड़े मामलों में सरकारी बागानों को लीज पर देने सहित विभिन्न निर्णयों पर सवाल उठे। (India Today)
यह ध्यान रखना जरूरी है कि राजनीतिक आरोप लगना और किसी मुख्यमंत्री का व्यक्तिगत भ्रष्टाचार अदालत में सिद्ध होना एक ही बात नहीं है।
निष्कर्ष:
तिवारी ने उत्तराखंड को आर्थिक इंजन दिया, लेकिन वह इंजन पहाड़ की चढ़ाई पूरी तरह नहीं चढ़ पाया। औद्योगिक उत्तराखंड मजबूत हुआ, मगर पर्वतीय उत्तराखंड की पलायन की समस्या बनी रही।
- मेजर जनरल बी.सी. खंडूरी
कार्यकाल: 7 मार्च 2007 – 26 जून 2009 तथा 11 सितंबर 2011 – 13 मार्च 2012
उत्तराखंड की राजनीति में अगर किसी मुख्यमंत्री के साथ सबसे मजबूती से “ईमानदार प्रशासक” की छवि जुड़ी तो वह बी.सी. खंडूरी थे।
उनकी सैन्य पृष्ठभूमि उनके प्रशासन में भी दिखाई देती थी—अनुशासन, खर्च पर नियंत्रण और नौकरशाही को जवाबदेह बनाने का प्रयास।
सबसे बड़ा कदम—लोकायुक्त
दूसरे कार्यकाल में खंडूरी सरकार ने बेहद मजबूत लोकायुक्त विधेयक आगे बढ़ाया। इसके दायरे में मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और वरिष्ठ अधिकारियों तक को लाने का प्रस्ताव था।
यही कारण था कि उस दौर में नारा चला—
“खंडूरी है जरूरी।”
सकारात्मक पक्ष
भ्रष्टाचार विरोधी छवि, प्रशासनिक अनुशासन, सरकारी खर्च पर नियंत्रण और पारदर्शिता बढ़ाने के प्रयास उनकी पहचान बने।
कमजोरी
ईमानदार मुख्यमंत्री होना और पूरी सरकारी मशीनरी को ईमानदार बना देना दो अलग बातें हैं।उनके कार्यकाल में भी नौकरशाही और सरकार की कार्यशैली को लेकर शिकायतें बनी रहीं। राजनीतिक प्रबंधन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी माना गया।
2012 में भाजपा सरकार सत्ता के बेहद करीब पहुंची, लेकिन खंडूरी स्वयं कोटद्वार से चुनाव हार गए।
निष्कर्ष:
उत्तराखंड में अगर किसी मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत सादगी और भ्रष्टाचार विरोध को अपनी राजनीतिक पहचान बनाया, तो खंडूरी उसका सबसे मजबूत उदाहरण रहे।
- डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’
कार्यकाल: 27 जून 2009 – 10 सितंबर 2011
निशंक सरकार का कार्यकाल विकास की घोषणाओं से ज्यादा विवादों के कारण चर्चा में रहा।
सकारात्मक पक्ष
पर्यटन, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे को आगे बढ़ाने का प्रयास हुआ। सरकार उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने की नीति पर आगे बढ़ना चाहती थी।
लेकिन यहीं से विवाद शुरू हुए।
56 जलविद्युत परियोजनाओं का विवाद
56 छोटी जलविद्युत परियोजनाओं के आवंटन को लेकर गंभीर सवाल उठे। विवाद बढ़ने के बाद प्रक्रिया को लेकर सरकार को पीछे हटना पड़ा। निशंक ने उस समय आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि अंतिम आवंटन नहीं हुआ था और प्रक्रिया पूर्ववर्ती नीति के अनुसार चल रही थी।
जमीन से जुड़ा विवाद
ऋषिकेश क्षेत्र में लगभग 15 एकड़ औद्योगिक भूमि के land-use परिवर्तन और निजी डेवलपर को लाभ पहुंचाने के आरोप भी उस समय राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता से आए। सरकार ने निर्णय को नियमों और BIFR प्रक्रिया के अनुरूप बताया, जबकि विपक्ष ने गंभीर अनियमितता के आरोप लगाए।
इन विवादों ने सरकार की छवि को इतना नुकसान पहुंचाया कि 2011 में भाजपा ने चुनाव से कुछ महीने पहले नेतृत्व बदलकर दोबारा बी.सी. खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया।
निष्कर्ष:
निशंक कार्यकाल उत्तराखंड के लिए इस बात का उदाहरण बना कि विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता पर जरा सा संदेह भी सरकार की पूरी राजनीतिक छवि पर भारी पड़ सकता है।
- विजय बहुगुणा
कार्यकाल: 13 मार्च 2012 – 31 जनवरी 2014
विजय बहुगुणा का मुख्यमंत्री काल हमेशा 2013 की केदारनाथ आपदा के संदर्भ में याद किया जाएगा।
यह उत्तराखंड के इतिहास की सबसे भयावह प्राकृतिक त्रासदियों में से एक थी।
सकारात्मक पक्ष
इतनी विशाल आपदा में सेना, ITBP, NDRF और दूसरी एजेंसियों के साथ मिलकर एक लाख के आसपास लोगों को निकालने का विशाल अभियान चला। स्वयं बहुगुणा ने भी कहा था कि इतनी बड़ी आपदा छोटे राज्य की क्षमता से बहुत बड़ी थी।
लेकिन सबसे बड़ी आलोचना—आपदा प्रबंधन
आपदा से पहले तैयारी, चेतावनी व्यवस्था, राहत कार्यों के शुरुआती समन्वय और सरकार की प्रतिक्रिया पर गंभीर आलोचना हुई।
यहां तक कि आपदा के शुरुआती दिनों में मुख्यमंत्री के दिल्ली में होने को लेकर भी राजनीतिक सवाल उठे।
यही आपदा अंततः उनके नेतृत्व पर भारी पड़ी और जनवरी 2014 में उनकी जगह हरीश रावत मुख्यमंत्री बने।
निष्कर्ष:
बहुगुणा सरकार के अच्छे-बुरे कामों पर बहस हो सकती है, लेकिन इतिहास ने उनके मुख्यमंत्री काल को लगभग पूरी तरह 2013 की आपदा की कसौटी पर दर्ज कर दिया।
- हरीश रावत
कार्यकाल: फरवरी 2014 – मार्च 2017, बीच में राष्ट्रपति शासन के दो छोटे अंतराल
हरीश रावत उत्तराखंड के सबसे अनुभवी राजनीतिक मुख्यमंत्रियों में रहे।
उनकी राजनीति की ताकत थी—गांव, किसान, पहाड़ की संस्कृति और सामाजिक योजनाओं को सीधे राजनीतिक विमर्श में लाना।
सकारात्मक काम
उनकी सरकार ने पेंशन योजनाओं का दायरा काफी बढ़ाया। स्वयं रावत ने 2017 में दावा किया था कि मुख्यमंत्री बनने के समय लगभग 1.74 लाख लोगों को पेंशन मिलती थी, जिसे उनके शासन में लगभग 7.5 लाख तक पहुंचाया गया। दूध उत्पादकों को बोनस और ग्रामीण सड़कों पर भी जोर दिया गया।
2013 की आपदा के बाद केदारनाथ और चारधाम क्षेत्र में पुनर्निर्माण और यात्रा को सामान्य करने का बड़ा काम भी उनके शासन के दौरान आगे बढ़ा।
लेकिन फिर आया 2016
हरीश रावत सरकार के इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक तूफान 2016 में आया।
कांग्रेस के विधायकों की बगावत हुई और सरकार अल्पमत के संकट में पहुंची।
इसी दौरान एक स्टिंग सामने आया जिसमें कथित तौर पर विधायकों के समर्थन को लेकर बातचीत दिखाई गई। मामला CBI तक पहुंचा और बाद में FIR भी दर्ज हुई। हरीश रावत लगातार आरोपों से इनकार करते रहे और इसे अपनी सरकार गिराने की साजिश बताते रहे।
मामले में आरोप और जांच को दोषसिद्धि समझना उचित नहीं होगा।
राजनीतिक संकट इतना गहरा था कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगा और मामला हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। अंततः फ्लोर टेस्ट के बाद रावत सरकार बहाल हुई।
निष्कर्ष:
हरीश रावत का कार्यकाल एक तरफ सामाजिक योजनाओं और जमीनी राजनीति का दौर था, दूसरी तरफ सत्ता बचाने की लड़ाई और 2016 के स्टिंग ने उनकी पूरी विरासत पर स्थायी विवाद की छाया डाल दी।
- त्रिवेंद्र सिंह रावत
कार्यकाल: 18 मार्च 2017 – 9 मार्च 2021
2017 में भाजपा 57 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई और त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने।
सकारात्मक पक्ष
उनकी सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरुआत में कड़ा संदेश दिया। NH-74 भूमि मुआवजा घोटाले की जांच इसका बड़ा उदाहरण बनी।
स्वास्थ्य क्षेत्र में अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना उनके शासन की प्रमुख योजनाओं में रही।
देवस्थानम बोर्ड
चारधाम देवस्थानम बोर्ड बनाने का फैसला प्रशासनिक सुधार के रूप में पेश किया गया, लेकिन तीर्थ पुरोहितों और परंपरागत हक-हकूकधारियों के विरोध के कारण यह बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया।
सबसे गंभीर विवाद—भ्रष्टाचार आरोप और हाईकोर्ट
2020 में पत्रकार उमेश कुमार(वर्तमान में निर्दलीय विधायक खानपुर हरिद्वार) द्वारा लगाए गए आरोपों से जुड़ा मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने आरोपों की CBI जांच/FIR के निर्देश दिए।
यह अत्यंत गंभीर न्यायिक घटनाक्रम था।
लेकिन यहां पूरी कानूनी स्थिति बताना जरूरी है—मामला आगे सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और हाईकोर्ट के निर्देश को चुनौती दी गई। इसलिए आरोप को सिद्ध भ्रष्टाचार के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
लगभग चार साल पूरे करने से कुछ दिन पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा।
निष्कर्ष:
भारी बहुमत से शुरू हुई सरकार प्रशासनिक प्रयोगों और भ्रष्टाचार विरोधी दावों के साथ चली, लेकिन अंत आते-आते राजनीतिक असंतोष और विवाद इतने बढ़े कि भाजपा को चुनाव से एक साल पहले नेतृत्व बदलना पड़ा।
- तीरथ सिंह रावत
कार्यकाल: 10 मार्च 2021 – 4 जुलाई 2021
उत्तराखंड के इतिहास के सबसे छोटे और सबसे असामान्य मुख्यमंत्री कार्यकालों में से एक।लगभग चार महीने में सरकार की उपलब्धियों से ज्यादा मुख्यमंत्री के बयान राष्ट्रीय सुर्खियां बने।
महिलाओं की ripped jeans पर टिप्पणी से लेकर कोविड और कुंभ से जुड़ी बयानबाजी तक कई विवाद पैदा हुए।
कुंभ और कोविड टेस्टिंग विवाद
2021 हरिद्वार कुंभ के दौरान बड़े पैमाने पर फर्जी कोविड टेस्ट किए जाने का मामला सामने आया और निजी एजेंसियों के खिलाफ FIR दर्ज हुई।
तीरथ सिंह रावत ने कहा कि निजी कंपनियों को लगाने का फैसला उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले लिया गया था और उन्होंने जांच के आदेश दिए। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की।
इसलिए इस घोटाले को सीधे तीरथ सिंह रावत का व्यक्तिगत भ्रष्टाचार कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
कुछ ही महीनों में संवैधानिक/चुनावी परिस्थितियों के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
निष्कर्ष:
तीरथ सरकार कोई स्थायी प्रशासनिक विरासत बनाने से पहले ही समाप्त हो गई।
- पुष्कर सिंह धामी
कार्यकाल: 4 जुलाई 2021 से वर्तमान
धामी पहले 2021 में मुख्यमंत्री बने और 2022 में भाजपा की दोबारा जीत के बाद पुनः मुख्यमंत्री बने। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार उनका दूसरा कार्यकाल 23 मार्च 2022 से जारी है।
उनके शासन की सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान बड़े और वैचारिक फैसलों से बनी है।
प्रमुख काम
समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करना उनके कार्यकाल की सबसे चर्चित उपलब्धि है।
इसके अलावा सख्त नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण कानून में कड़ाई, दंगा-विरोधी कानून, सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई और भर्ती प्रक्रिया में सुधार सरकार की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। राज्य सरकार के अनुसार चार वर्षों में 30 हजार से अधिक सरकारी नियुक्तियां हुईं।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और नकल के मामलों ने युवाओं में भारी आक्रोश पैदा किया। हालांकि इन्हीं घटनाओं के बाद सरकार ने देश के सबसे कठोर नकल विरोधी कानूनों में से एक बनाया।
अंकिता भंडारी हत्याकांड, बेरोजगारी, भू-कानून, मूल निवास, पलायन और पर्यावरण बनाम विकास का सवाल सरकार के सामने लगातार राजनीतिक चुनौती बना रहा।
धामी का अंतिम मूल्यांकन अभी नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका कार्यकाल जारी है।
और अब 25 साल का असली हिसाब
अगर हर मुख्यमंत्री को एक पंक्ति में समझना हो तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है—
नित्यानंद स्वामी — नए राज्य की प्रशासनिक नींव।
भगत सिंह कोश्यारी — छोटा संक्रमणकाल।
एन.डी. तिवारी — औद्योगिक विकास की सबसे मजबूत नींव, लेकिन उनके शासन के फैसलों पर अनेक अनियमितताओं के आरोप भी लगे।
बी.सी. खंडूरी — ईमानदार और अनुशासित प्रशासन की सबसे मजबूत सार्वजनिक छवि तथा सशक्त लोकायुक्त की पहल।
रमेश पोखरियाल निशंक — विकास की महत्वाकांक्षा, लेकिन जलविद्युत और भूमि से जुड़े विवादों ने सरकार की छवि को भारी नुकसान पहुंचाया।
विजय बहुगुणा — 2013 की आपदा और उसके प्रबंधन की कसौटी पर याद किया जाने वाला शासन।
हरीश रावत — मजबूत जमीनी राजनीति और सामाजिक योजनाएं, लेकिन 2016 के सत्ता संकट और स्टिंग ने विरासत को विवादित किया।
त्रिवेंद्र सिंह रावत — बड़े बहुमत की सरकार, प्रशासनिक प्रयोग और भ्रष्टाचार विरोध का दावा; साथ ही उनके खिलाफ लगे आरोपों पर हाईकोर्ट के CBI जांच निर्देश जैसा अभूतपूर्व विवाद।
तीरथ सिंह रावत — इतना छोटा कार्यकाल कि काम से ज्यादा विवाद और कुंभ-कोविड का दौर याद रहा।
पुष्कर सिंह धामी — UCC, नकल विरोधी कानून और कई कड़े नीतिगत फैसलों का दौर; लेकिन रोजगार, पलायन, भू-कानून और हिमालयी विकास मॉडल की परीक्षा अभी बाकी है।
सबसे बड़ा घोटाला शायद कोई एक घोटाला नहीं है
उत्तराखंड में 25 वर्षों में जमीन पर सवाल उठे।
जलविद्युत परियोजनाओं पर सवाल उठे।
भर्तियों पर सवाल उठे।
खनन पर सवाल उठे।
आपदा के बाद राहत व्यवस्था पर सवाल उठे।
कोविड टेस्टिंग तक पर सवाल उठे।
CAG ने भी उत्तराखंड की जलविद्युत परियोजनाओं में योजना, क्रियान्वयन, निगरानी और पर्यावरणीय पहलुओं में गंभीर कमियां दर्ज की थीं।
लेकिन उत्तराखंड का सबसे बड़ा नुकसान शायद किसी एक फाइल में बंद “घोटाला” नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
जिस राज्य के पास पानी है, जंगल है, जमीन है, पर्यटन है, तीर्थ हैं, जलविद्युत है और देश की राजधानी के इतने करीब होने का भौगोलिक लाभ है—उस राज्य के हजारों गांव आज भी खाली क्यों हो रहे हैं?
25 साल में उद्योग आए, लेकिन पहाड़ में रोजगार क्यों नहीं आया?
सड़कें बनीं, लेकिन सड़क बनने के बाद गांव खाली क्यों हुआ?
पर्यटन बढ़ा, लेकिन पर्यटन की कमाई का कितना हिस्सा पहाड़ के सामान्य परिवार तक पहुंचा?
सरकारी बजट कई गुना बढ़ा, लेकिन देहरादून और पहाड़ के दूरस्थ गांव के बीच विकास की दूरी क्यों बढ़ती गई?
और सबसे महत्वपूर्ण—
हर सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ आई, फिर अगली सरकार ने पिछली सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप क्यों लगाए?
भाजपा ने कांग्रेस की जांच बैठाई।
कांग्रेस आई तो भाजपा के कार्यकाल पर जांच बैठी।
फिर भाजपा आई तो कांग्रेस पर जांच बैठी।
SIT बनी।
आयोग बने।
FIR हुईं।
CBI पहुंची।
मामले अदालतों तक गए।
लेकिन उत्तराखंड की जनता आज भी पूछ सकती है—
अगर 25 साल में इतने घोटाले हुए तो अंतिम रूप से दोषी कितने बड़े लोग साबित हुए और जनता का पैसा कितना वापस आया?
यही उत्तराखंड की राजनीति का सबसे असहज प्रश्न है।
क्योंकि राज्य आंदोलनकारियों ने उत्तराखंड इसलिए नहीं मांगा था कि केवल मुख्यमंत्री का पता लखनऊ से बदलकर देहरादून हो जाए।
उन्होंने उत्तराखंड इसलिए मांगा था कि व्यवस्था बदले।
25 साल बाद असली मूल्यांकन किसी मुख्यमंत्री की तस्वीर, पार्टी या भाषण से नहीं होना चाहिए।
कसौटी सिर्फ पांच होनी चाहिए—
कितना रोजगार पैदा हुआ?
कितना पलायन रुका?
कितने गांव बचे?
प्राकृतिक संसाधनों का कितना लाभ उत्तराखंड को मिला?
और भ्रष्टाचार करने वाले कितने ताकतवर लोगों को वास्तव में सजा मिली?
इन पांच सवालों का जवाब जिस दिन उत्तराखंड की राजनीति ईमानदारी से दे देगी, उसी दिन तय हो जाएगा कि 25 साल में कौन सा मुख्यमंत्री इतिहास में सफल हुआ और कौन केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर चला गया।
क्योंकि सरकारें दस हुईं, मुख्यमंत्री बदलते रहे—लेकिन उत्तराखंड का असली सवाल आज भी वही है:
“राज्य तो मिल गया… लेकिन क्या वह उत्तराखंड भी मिला, जिसके लिए आंदोलनकारियों ने संघर्ष किया था?”

