आज उत्तराखंड 26 साल का युवा प्रदेश है लेकिन बड़े अफसोस के साथ लिखना पड़ रहा है कि उत्तराखंड जवान तो हो गया है । इसका शरीर बड़ा हो रहा है लेकिन पोलियो से ग्रस्त इसके पैर ब्यूरोक्रेसी की व्हीलचेयर पर उसी दिन से आ गए जब हमारे नेताओं ने ब्यूरोक्रेसी के सामने घुटने टेक दिए।
कोदा झंगोरा खायेंगे उत्तराखंड बनाएंगे …..। यही तो सोचा था कि अपने लोग होंगे, अपने नेता होंगे, अपना राज होगा। पर क्या हुआ? अपनो की राज की जगह अफसरों का राज?
नौकरशाही वो घुड़सवारी है जिसकी लगाम नेताओं के हाथ में होनी चाहिए थी पर अफसोस? नेताओं की लगाम यहां ब्यूरोक्रेसी के हाथों में है।
आखिर इसका कारण क्या है? इस पर भी प्रकाश डालना जरूरी है। लोग गाहे बगाहे कहते रहते हैं कि जो गांव के प्रधान नहीं बन सकते थे वो विधायक ,मंत्री बन गए। इसका कारण यही है कि कुछ अयोग्य व्यक्ति पार्टियों की आड़ में जनप्रतिनिधि बन गए। डग्गामारी से डिग्रियां तो ले ली पर शिक्षित नहीं हो पाए। इसीलिए ब्यूरोक्रेसी ने भी इनकी नब्ज पकड़ ली दूसरी बड़ी बात कि कई नेताओं के उत्तराखंड से पहले खाने के भी लाले पड़े थे । उन्होंने जनप्रतिनिधि बनते ही अपने लिए अकूत संपत्तियां इकठ्ठा करने का मिशन बना लिया। नौकरशाह नाम की बिल्ली दूध की हंडियों की रखवाली में बैठी हैं, इस दूध की मलाई चाटने के लिए जनप्रतिनिधि नौकरशाही के चरणों में नतमस्तक रहते है ताकि मलाई का कुछ हिस्सा उनके मुंह भी लग जाये।
ये जालिम बिल्लियां ऐसी हैं कि दूध भी चट कर रही हैं और डकार भी नहीं ले रही हैं ।
नौकरशाही के लिए भी आज ये प्रदेश नोट कमाने की मशीन है। खनन , शराब , जमीनों के धंधे में अधिकारियों की पत्तियां सेट हैं। एक पूर्व सीएम और आईएएस ओमप्रकाश जैसे नौकरशाहों की शराब के खेल में दस दस करोड़ की डील के स्टिंग तो सभी ने देखे।
जमीनों के धंधे में कैसे कई अधिकारियों की पोल पट्टी खुली।
कई घपले घोटाले खुले। जांच कमेटी बैठी , कमेटी ने कई साल जांच की , रिपोर्ट आई कि आगे से ऐसा नही होगा और दूध की हंडिया चट करने वाली बिल्लियों का प्रमोशन हो गया।
बाद में यहां के नेता जी रोना रोते हैं कि मेरा तो एसडीएम भी फोन नहीं उठाता। अरे भाई.. क्यों उठाएगा उन्हें तुम्हारे नैतिक पतन की पूरी जानकारी है कि बजट में तुम्हारा कितना हिस्सा है? मेरे पिता जी कहते थे कि जिसका ईमान ज़िंदा नहीं उसका इक़बाल कभी बुलंद नहीं होता, जिस अधिकारी ने तुम्हें माँ डकारते देखा है उसे आँख कैसे दिखा सकते हो। मैं कई को जानता हूँ जो पीडब्ल्यूडी, ऊर्जा और सिंचाई विभाग के EX EN के पीछे पड़े रहते है अपने 5% के कमीशन के लिए और धमकी देते है अगर नहीं दिए तो तेरे भ्रष्टाचार की पोल खोल दूँगा , चोर-चोर मौसेरे भाई।
एन.डी. तिवारी से लेकर आजतक सरकारों के चेहरे बदले पर चरित्र वही रहा।नेता पांच साल के कॉन्ट्रैक्ट पर आते हैं , पांच साल में कितना कमाया जाय ,उनका ध्यान इसी पर है। परमानेंट जमी हुई नौकरशाही को पता है इन पांच सालों में नेताजी को कैसे मैनेज करना है?
बड़े ही अफसोस की बात है कि आज नौकरशाही ही मनमाने तरीके से इस प्रदेश को चला रही है। जल्द ही एक किताब कई नौकरशाहो के घपले घोटालों और कहां कहां अकूत संपत्तियां जोड़ी हैं उनपर सबूतों के साथ लिखूंगा।

